अब हे राजन् ! जिसकी ध्वजापर हनुमान हैं ऐसे अर्जुनने कौरवोंको व्यूहबद्ध देखकर, हथियार चलने की तैयारीके समय अपना धनुष चढ़ाकर हृषीकेशसे ये वचन कहे :
अर्जुन बोले : २०
हे अच्युत ! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें ले जाकर खड़ा कर दीजिए ; जिससे युद्ध की कामनासे खड़े हुए लोगोंको मैं देखूं और जानूं कि इस रण-संग्राममें मुझे किसके साथ लड़ना है। दुष्ट बुद्धिवाले दुर्योधनका युद्धमें प्रिय कार्य करनेकी इच्छावाले जो योद्धा यहाँ एकत्र हुए हैं, उन्हें मैं देखें तो सही ।
संजय बोले :
२१-२२-२३, हे राजन् ! जब अर्जुनने श्रीकृष्णसे ऐसा कहा तब उन्होंने दोनों सेनाओंके बीच, सारे राजाओं तथा भीष्म और द्रोणके सामने वह उत्तम रथ खड़ा करके कहा :
'हे पार्थ! एकत्र हुए इन कौरवोंको तू देख । ' ' २४-२५
वहाँ दोनों सेनाओं में स्थित गुरुजनों, पितामहों, आचार्यो, मामाओं, माइयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, श्वसुरों तथा स्नेहीजनों आदिको अर्जुनने देखा । उन सब बन्धु बान्धवोंको इस प्रकार आमने-सामने खड़े देखकर खेद उत्पन्न होने के कारण दीन बने हुए कुन्ती- पुत्र अर्जुन इस प्रकार बोले : २६-२७-२८
अर्जुन बोले :
हे कृष्ण ! लड़नेके लिए उत्सुक और एकत्र इन सगे-सम्बन्धियोंको देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं । मेरा मुँह सूख रहा है, शरीरमें कंपकपी छूट रही है और मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं । मेरे हाथसे गाण्डीव फिसल रहा है। त्वचा जली जा रही है । मुझसे खड़ा नहीं रहा जाता, क्योंकि मेरा मस्तिष्क घूमता-सा लग रहा है । २८-२९-३० इसके अतिरिक्त, हे केशव ! मैं यहाँ विपरीत और अशुभ चिह्न देखता हूँ । युद्धमें इन स्वजनोंको मारने में कोई कल्याण नहीं देखता । ३१ हे कृष्ण ! उन्हें मारकर न तो मैं विजय चाहता हूँ, और न राज्य अथवा विविध प्रकारके सुख; हे गोविन्द ! हमारे लिए राज्यका, भोगों या जीवनका मी क्या उपयोग है ? ३२
जिनके लिए हमने राज्य, भोग और सुखकी इच्छा की, वे आचार्य, गुरुजन, पुत्र, पौत्र, दादा, मामा, ससुर, साले और दूसरे सम्बन्धी जन तो प्राणोंकी और धनकी परवाह न करके लड़नेके लिए खड़े हैं। ३३-३४
भले ही वे मुझे मार डालें, परन्तु तीनों लोकोंके राज्यके लिए भी, हे मधु- सूदन ! मैं उनकी हत्या नहीं करना चाहता; तब इस भूमिके लिए तो मैं उनकी हत्या कर ही कैसे सकता हूँ ? ३५