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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/१४४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

सब लोग निरन्तर तेरी निन्दा किया करेंगे। और प्रतिष्ठित मनुष्यके लिए अपकीर्ति तो मृत्युसे भी बुरी है ।

३४

जिन महारथियोंमें तूने सम्मान प्राप्त किया है, वे तुझे भयके कारण रणसे भागा हुआ मानेंगे और उनके बीच तेरी प्रतिष्ठा घट जायेगी ।

३५

और तेरे शत्रु तेरे बलकी निन्दा करते-करते न बोलने योग्य अनेक वचन बोलेंगे; इससे अधिक कष्टकर और क्या हो सकता है ? {{Right|३६| यदि तू युद्धमें मारा गया, तो तुझे स्वर्ग प्राप्त होगा । यदि तू जीत गया, तो पृथ्वीका उपभोग करेगा। इसलिए हे कौन्तेय ! तू लड़नेका निश्चय करके खड़ा हो ।

३७

टिप्पणी : भगवानने पहले आत्माका नित्यत्व और देहका अनित्यत्व अर्जुनको समझाया । उसके बाद यह भी बताया कि सहज प्राप्त युद्ध करनेमें क्षत्रियके लिए धर्मकी कोई बाधा नहीं हो सकती । इसलिए ३१वें श्लोकसे भगवान श्रीकृष्णने परमार्थके साथ उपयोगिताका [ लाभ-हानिकी व्यावहारिक दृष्टिका ] मेल बैठाया है । अब भगवान गीताके मुख्य बोधकी झाँकी एक श्लोकमें कराते हैं । सुख और दुःख, लाभ और हानि, जय और पराजयको समान समझकर तू लड़नेके लिए तैयार हो जा। ऐसा करनेसे तुझे पाप नहीं लगेगा ।

३८

मैंने सांख्य-सिद्धान्त ( ज्ञाननिष्ठा) के अनुसार तुझे तेरा यह कर्त्तव्य समझाया । अब योगवादके अनुसार समझाता हूँ । उसे सुन। इसका आश्रय लेनेसे तू कर्म- बन्धन तोड़ सकेगा ।

३९

इस निष्ठासे आरम्भ ( कार्य ) का नाश नहीं होता, इसमें विपरीत परिणाम भी नहीं आता । इस धर्मका अल्प-सा पालन भी महाभयसे उबार लेता है ।

४०

हे कुरुनन्दन ! (योगवादीकी) निश्चयात्मक बुद्धि एकरूप होती है,जबकि अनिश्चयवाले मनुष्यकी बुद्धियाँ अर्थात् वासनाएँ अनेक शाखाओंवाली और अनन्त होती हैं ।

४१

टिप्पणी : बुद्धि जब एक न रहकर अनेक (बुद्धियाँ) हो जाती हैं तब वह बुद्धि न रहकर वासना का रूप ले लेती है। इसलिए बुद्धियाँ अर्थात् वासनाएँ ।

वेदोंकी शाब्दिक चर्चामें रत रहनेवाले अज्ञानी, 'इसके अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है' ऐसा कहनेवाले, कामनावाले तथा स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले लोग जन्म- मरण-रूपी कर्मके फल देनेवाली तथा भोग और ऐश्वर्य प्राप्त करनेके लिए किये जाने- वाले (विविध) कर्मोके वर्णनसे भरी हुई वाणी बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं; भोग और ऐश्वर्यमें आसक्त ऐसे लोगोंकी यह बुद्धि नष्ट हो जाती है। उनकी बुद्धि न तो निश्चयवाली होती और न समाधिके विषय में स्थिर हो सकती । टिप्पणी : ऊपरके तीन श्लोकों में योगवादकी तुलना में कर्मकाण्डका अर्थात् वेदवादका वर्णन किया गया है। कर्मकाण्ड अथवा वेदवादका अर्थ है फल उत्पन्न करनेके लिए प्रयत्न करनेवाली असंख्य क्रियाएँ। ये क्रियाएँ वेदान्तसे अर्थात् वेदके रहस्यसे अलग और अल्प परिणामवाली होनेके कारण निरर्थक होती हैं । ४२-४३-४४