विषयोंमें मटकनेवाली इन्द्रियोंके पीछे जिसका मन दौड़ता है, उसका मन - वायु जिस प्रकार नावको पानीमें कहीं भी खींचकर ले जाती है उसी प्रकार - उसकी बुद्धिको चाहे जहाँ खींचकर ले जाता है ।
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इसलिए हे महाबाहो ! जिसकी इन्द्रियाँ सब ओरके विषयोंसे मुक्त होकर उसके वशमें हो जाती हैं, उस पुरुषकी बुद्धि स्थिर हो जाती है ।
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जिस समय सब प्राणी सोये होते हैं, उस समय संयमी पुरुष जागता है । और जिस समय सब लोग जागते हैं, उस समय ज्ञानवान मुनि सोता है ।
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टिप्पणी : भोगी मनुष्य रातके बारह-एक बजे तक नाच-गान, राग-रंग, खानपान आदि में अपना समय बिताते हैं और फिर सवेरे सात-आठ बजेतक सोते रहते हैं । संयमी मनुष्य रातमें सात-आठ बजे सो जाते हैं और मध्यरात्रिमें उठकर ईश्वरका ध्यान करते हैं ।
इसके सिवा, भोगी मनुष्य संसारका प्रपंच बढ़ाता है और ईश्वरको भूल जाता है, जबकि संयमी मनुष्य संसारके प्रपंचसे अनजान रहता है और ईश्वरका साक्षात्कार करता है। इस तरह इन दोनोंके पंथ अलग-अलग हैं, ऐसा भगवानने इस श्लोक में सूचित किया है ।
सब ओरसे निरन्तर पानी भरते रहनेपर भी जिसकी मर्यादा अचल रहती है, ऐसे समुद्र में जिस प्रकार सारा पानी आकर समा जाता है, उसी प्रकार जिस मनुष्यमें सांसारिक भोग शान्त हो जाते हैं वहीं शान्ति प्राप्त करता है, कामनावाला मनुष्य नहीं ।
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सारी कामनाओंका त्याग करके जो पुरुष इच्छा, ममता और अहंकारसे रहित होकर इस संसार में रहता है, वही शान्ति प्राप्त करता है ।
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हे पार्थ! ईश्वरको पहचाननेवाले पुरुषकी ऐसी स्थिति होती है । इस स्थितिको प्राप्त करनेके बाद मोहके वश नहीं होता; और मृत्यु के समय भी ऐसी ही स्थिति बनी रहे, तो वह ब्रह्मनिर्वाणको प्राप्त करता है ।
ॐ तत्सत्
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जो ब्रह्मविद्या भी है और योगशास्त्र भी है, श्रीभगवान द्वारा गाये गये ऐसे इस उपनिषद् में आये हुए श्रीकृष्ण तथा अर्जुनके संवादका 'सांख्ययोग' नामक दूसरा अध्याय यहाँ समाप्त होता है ।