अन्नसे भूतमात्र उत्पन्न होते हैं । अन्न वर्षासे उत्पन्न होता है । वर्षा यज्ञसे होती है । और यज्ञ कर्मसे होता है । तू यह जान कि कर्म प्रकृतिसे उत्पन्न होता है, प्रकृति अक्षर-ब्रह्मसे उत्पन्न होती और इसलिए सर्वव्यापक ब्रह्म सदा यज्ञमें प्रतिष्ठित रहता है ।
१४-१५
इस प्रकार चलाये हुए चक्रका जो मनुष्य अनुसरण नहीं करता, वह अपने जीवनको पापपूर्ण बनाता है, इन्द्रिय-सुखों में डूबा रहता है और हे पार्थ! वह व्यर्थ ही जीता है ।
१६
परन्तु जो मनुष्य आत्मामें मग्न रहनेवाला है, जो आत्मासे ही तृप्त रहता है और आत्मामें ही सन्तोष मानता है, उसके लिए कुछ करना जरूरी नहीं रहता ।
१७
कर्म करने या न करनेमें उसका कोई भी स्वार्थ नहीं होता । भूतमात्रके विषय में उसका कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं होता ।
१८
इसलिए तू तो संग-रहित होकर निरन्तर करने योग्य कर्म करता रह । संग- रहित होकर कर्म करनेवाला पुरुष मोक्षको प्राप्त करता है ।
१९
जनक- जैसे अनेक लोग कर्मके द्वारा ही परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ।
लोक-संग्रहका विचार करके भी तुझे कर्म करना चाहिए ।
२०
(क्योंकि) उत्तम पुरुष जो-जो आचरण करते हैं, उसका अनुकरण सामान्य लोग करते हैं । जिस (आदर्श) को उत्तम पुरुष प्रमाण बनाते हैं, उसका सामान्य लोग अनु- सरण करते हैं ।
२१
हे पार्थ! मेरे लिए तीनों लोकोंमें कुछ भी करने जैसा नहीं है। ऐसा भी नहीं कि प्राप्त करने योग्य कोई वस्तु मुझे नहीं मिली है; तो भी मैं सदा कर्ममें ही लगा रहता हूँ ।
२२
टिप्पणी :सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदिकी निरन्तर तथा अचूक गति ईश्वरके कर्म सूचित करती है । ये कर्म मानसिक नहीं किन्तु शारीरिक माने जायेंगे ।
यहाँ ऐसी शंकाके लिए गुंजाइश नहीं है कि : "ईश्वर निराकार होते हुए भी शारीरिक कर्म करता है, यह कैसे कहा जा सकता है ? " क्योंकि वह अशरीरी होते हुए भी शरीरीके समान व्यवहार करता दिखाई देता है । इसीलिए वह कर्म करते हुए भी 'अकर्मकृत' और अलिप्त है ।
मनुष्यको समझना तो यह है कि जिस प्रकार ईश्वरकी प्रत्येक कृति यन्त्रवत् काम करती है, उसी प्रकार मनुष्यको भी बुद्धिपूर्वक किन्तु यन्त्रके समान ही नियमित कार्य करने चाहिए। मनुष्यकी विशेषता यन्त्रगतिका अनादर करके स्वच्छन्द बननेमें नहीं, परन्तु ज्ञानपूर्वक उस गतिका अनुकरण करनेमें है ।
मनुष्य अलिप्त रहकर, संग-रहित होकर, यन्त्रवत् कार्य करे, तो इससे उसका शरीर कभी क्षीण नहीं होता। वह मृत्यु पर्यन्त ताजा और स्फूर्तिवाला बना रहता है। शरीरके नियमोंका अनुसरण करके तथा अपना समय पूरा हो जानेपर शरीर नष्ट हो जाता है, परन्तु उसमें बसी हुई आत्मा जैसी थी वैसी ही बनी रहती है ।