यदि मैं कभी अँगड़ाई लेनेके लिए भी रुके बिना निरन्तर कर्ममें प्रवृत्त न रहूँ, तो हे पार्थ! लोग हर तरहसे मेरे इस उदाहरणका अनुसरण करेंगे । यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब लोक नष्ट हो जायें, मैं अव्यवस्थाका कर्त्ता बनूं और समग्र मानव- जातिका नाश कर डालूं ।
२३-२४
हे भारत ! जिस प्रकार अज्ञानी लोग आसक्त होकर कर्म करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानीको आसक्तिरहित होकर लोक कल्याणकी इच्छासे कर्म करना चाहिए ।
२५
कर्ममें आसक्त रहनेवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिको ज्ञानी पुरुष डाँवाडोल - अस्थिर न करे, परन्तु समत्व कायम रखते हुए भली-भाँति कर्म करके ऐसे मनुष्योंको सब कर्म करनेकी प्रेरणा दे ।
२६
सब कर्म प्रकृतिके गुणों द्वारा ही किये जाते हैं। परन्तु अहंकारसे मूढ़ बना हुआ मनुष्य ' मैं कर्त्ता हूँ' ऐसा मान लेता है । इसके विपरीत, हे महाबाहो ! गुण और कर्मके विभागके रहस्यको जाननेवाला पुरुष 'गुण गुणोंमें बर्त रहे हैं' इसे ध्यानमें रखकर उनमें आसक्त नहीं होता ।
२७-२८
टिप्पणी : जिस प्रकार श्वासोच्छ्वास आदि क्रियाएँ अपने-आप होती हैं, उनमें मनुष्य आसक्त नहीं होता, और जब इन क्रियाओंसे सम्बन्धित किसी व्याधिसे ग्रस्त हो जाते हैं, तभी मनुष्यको उनकी चिन्ता करनी पड़ती है अथवा तभी उसे अपने इन अवयवोंके अस्तित्वका मान होता है; उसी प्रकार स्वाभाविक कर्म अपने-आप हों तो उनके विषय में आसक्ति नहीं होती । जिसका स्वभाव उदार है, वह स्वयं जानता भी नहीं कि मैं उदार हूँ। वह दान किये बिना रह ही नहीं सकता। ऐसी अनासक्ति मनुष्य में अभ्याससे और ईश्वर कृपासे हो आती है ।
प्रकृतिके गुणोंसे मोहमें पड़े हुए मनुष्य गुणोंके कार्योंमें आसक्त रहते हैं । ज्ञानी पुरुषोंको चाहिए कि वे इन अज्ञानी मन्दबुद्धि लोगोंको अस्थिर न बनायें ।
२९
अध्यात्म-वृत्ति रखकर, सारे कर्म मुझे अर्पण करके, आसक्ति और ममत्व छोड़ कर तथा राग-रहित होकर तू युद्ध कर ।
३०.
टिप्पणी: जो मनुष्य देहमें निवास करनेवाली आत्माको पहचानता है और वह आत्मा परमात्माका ही अंश है ऐसा जानता है, वह मनुष्य सब-कुछ परमात्माको ही अर्पण करेगा - जिस प्रकार सेवक स्वामीके आश्रयमें निभता है और सब कुछ उसीको अर्पण करता है ।
जो मनुष्य श्रद्धा रखकर और द्वेषको छोड़कर मेरे इस मतके अनुसार सदा आचरण करते हैं, वे भी कर्मके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ।
३१
परन्तु जो मेरे इस अभिप्रायमें दोष निकालकर इसका अनुसरण नहीं करते, वे ज्ञानहीन मूर्ख हैं । उनका नाश हो गया है, ऐसा ही तू समझ ।
३२
ज्ञानी पुरुष भी अपने स्वभावके अनुसार ही चलते हैं; प्राणिमात्र अपने स्वभाव
३३
का अनुसरण करते हैं । इसमें बलात्कार क्या कर सकता है ? टिप्पणी : यह श्लोक दूसरे अध्यायके ६१ से ६८ तकके श्लोंकोंका विरोधी नहीं है । इन्द्रियोंका निग्रह करते-करते मनुष्यको मर मिटना है; परन्तु ऐसा करते हुए भी