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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/१५५

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अनासक्तियोग

टिप्पणी :अर्थात् कोई भी मनुष्य ईश्वरीय नियमका उल्लंघन नहीं कर सकता । जैसा बोता है वैसा काटता है; जैसा करता है वैसा भरता है । ईश्वरके नियमका -- कर्मके नियमका कोई अपवाद नहीं होता। सबको समान अर्थात् अपनी-अपनी योग्यताके अनुसार न्याय मिलता है ।

कमोंकी सिद्धि चाहनेवाले लोग इस जगत् में देवताओंकी पूजा करते हैं। उससे उन्हें कर्म-जन्य फल इस मनुष्य-लोकमें ही मिल जाता है ।

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टिप्पणी : देवताओंका अर्थ स्वर्गमें बसनेवाले इन्द्र, वरुणादि देवता नहीं हैं। देवताका अर्थ है ईश्वरकी अंशरूप शक्ति । इस अर्थ में मनुष्य मी देवता है । माप, बिजली आदि महान शक्तियाँ देवता हैं। हम यह प्रत्यक्ष देखते हैं कि उनकी आराधना करनेका फल तुरन्त और इसी लोकमें मिलता है । वह फल क्षणिक है । वह फल जब आत्माको सन्तोषतक नहीं देता, तब मोक्ष तो दे ही कैसे सकता है ? गुण और कर्मके विभागोंके अनुसार मैंने चार वर्ण उत्पन्न किये हैं। उनका कर्त्ता होते हुए भी तू मुझे अविनाशी अकर्त्ता समझ ।

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कर्म मुझे स्पर्श नहीं करते। उनके फलके बारेमें मुझे कोई लालसा नहीं है । इस प्रकार जो मनुष्य मुझे भली-भाँति जानते हैं, वे कर्मोके बन्धनमें नहीं बँधते ।

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टिप्पणी :क्योंकि मनुष्यके सामने कर्म करते हुए भी अकर्मी रहनेका सर्वोत्तम उदा- हरण है । और सब कर्मोका कर्त्ता ईश्वर ही है, हम तो निमित्त मात्र हैं; तब फिर कर्त्तापनका अभिमान हमें क्यों होना चाहिए ? ऐसा जानकर प्राचीन कालके मुमुक्षुओंने कर्म किये हैं। इसलिए तू भी जिस प्रकार पूर्वज-गण सदा कर्म करते आये हैं उस प्रकार कर्म ही करता रह ।

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कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषयमें बुद्धिशाली लोग भी मोहमें पड़ जाते हैं । इसलिए कर्मके विषयमें मैं तुझे अच्छी तरह समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभसे बच सकेगा ।

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कर्मका, विकर्म (अर्थात् निषिद्ध कर्म ) का और अकर्मका भेद जानना चाहिए । कर्मकी गति गूढ़ है ।

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जो मनुष्य कर्ममें अकर्मको देखता है और अकर्ममें कर्मको देखता है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान माना जाता है । वह योगी है और वह सम्पूर्ण रूपसे कर्म करनेवाला है ।

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टिप्पणी : जो कर्म करते हुए भी कर्त्तापनका अभिमान नहीं रखता उसका कर्म अकर्म है । और जो बाहरसे कर्मका त्याग करके भी मनसूबे बाँधा करता है उसका वह अकर्म भी कर्म है । जिसे लकवा मार गया है उसका अपंग अवयव तभी हिलता है जब वह व्यक्ति उसे जान-बूझ -- अभिमानपूर्वक हिलाता है ।

यह बीमार अपना अंग हिलानेकी क्रियाका कर्त्ता बनता है । अकर्त्तापिन आत्माका गुण है । जो आत्मा मोहग्रस्त होकर अपनेको कर्त्ता मानती है, उस आत्माको मानो लकवा मार गया है और वह अभिमानी होकर कर्म करती है ।