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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/१६०

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

हे महाबाहो ! कर्मयोगके बिना कर्म संन्यास कठिनाईसे सिद्ध होता है, परन्तु समत्ववान मुनि शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त करता है ।

जिसने योग सिद्ध कर लिया है, जिसने अपने हृदयको विशुद्ध बना लिया है, जिसने मन और इन्द्रियोंको जीत लिया है और जो सारे भूतोंको अपने समान ही समझता है, वह मनुष्य कर्म करते हुए भी उससे अलिप्त रहता है ।

सत्वको जाननेवाला योगी देखते हुए, स्पर्श करते हुए, सूंघते हुए, खाते हुए, चलते हुए, सोते हुए, श्वास लेते हुए, बोलते हुए, कुछ छोड़ते हुए या लेते हुए तथा आँख खोलते और मींचते हुए भी केवल इन्द्रियाँ ही अपने-अपने कार्य करती हैं ऐसी भावना रखे और यह समझे कि 'मैं कुछ भी नहीं करता ।

८-९

टिप्पणी : जबतक मनुष्य में वासना और देहाभिमान होता है तबतक ऐसी अलिप्त स्थिति प्राप्त नहीं होती। इसलिए विषयासक्त मनुष्य यह कहकर छूट नहीं सकता कि 'विषयोंका भोग मैं नहीं करता, इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं।' ऐसा अनर्थ करनेवाला मनुष्य न तो गीताको समझता है और न धर्मको समझता है। नीचेका श्लोक इस बातको स्पष्ट करता है । जो मनुष्य कर्मोंको ब्रह्मार्पण कर देता है तथा आसक्ति छोड़कर कर्म करता है, वह पापसे उसी तरह अलिप्त रहता है जिस तरह पानी में रहनेवाला कमल पानीसे अलिप्त रहता है ।

१०

योगीजन शरीरसे, मनसे, बुद्धिसे अथवा केवल इन्द्रियोंसे भी आसक्ति-रहित होकर आत्मशुद्धिके लिए कर्म करते हैं ।

११

समतावान योगी कर्मफलका त्याग करके परम शान्तिको प्राप्त करता है; जब कि राग-द्वेषवाला मनुष्य कामनासे प्रेरित होनेके कारण कर्मफलमें आसक्त होकर बन्धनमें फँसता है ।

१२

संयमी पुरुष मनसे सारे कर्मोंका त्याग करके नौ द्वारोंवाले नगर-रूपी शरीरमें रहते हुए भी, न कुछ करता है न कुछ कराता हुआ, सुखसे रहता है ।

१३

टिप्पणी : दो नथुने, दो कान, दो आँख, मलत्यागके दो स्थान और मुंह - इस प्रकार शरीरके नौ मुख्य द्वार हैं। वैसे तो चमड़ीके असंख्य छेद भी शरीरके द्वार ही हैं ।

इन द्वारोंका चौकीदार यदि इनमें आवागमन करनेवाले अधिकारियोंको ही आने और जाने देकर अपने धर्मका पालन करे, तो उसके विषयमें यह कहा जा सकता है कि यह आवागमन होते रहनेपर भी चौकीदार उसमें भाग नहीं लेता, वह केवल उसका साक्षी है । इसलिए वह न तो कुछ करता है और न कुछ कराता है ।

जगतका प्रभु न तो कर्त्तापनकी रचना करता है, न कर्मकी और न वह कर्म तथा फलका मेल साधता है । प्रकृति ही सब कुछ करती है ।

१४

टिप्पणी : ईश्वर कर्त्ता नहीं है । कर्मका नियम अचल और अनिवार्य है । और जो मनुष्य जैसा करता है वैसा उसे भरना ही पड़ता है । इसीमें ईश्वरकी महादया, उसका न्याय समाहित है । शुद्ध न्यायमें शुद्ध दया है। शुद्ध न्यायकी विरोधिनी दया सच्ची