ऐसा अनुभव है । इसलिए योगीन्द्र पतंजलिने यम-नियमोंको प्रथम स्थान दिया है तथा उन्हें सिद्ध करनेवालेके लिए ही प्राणायामादि क्रियाओंको मोक्ष मार्गमें सहायक माना है ।
- यम पांच हैं : अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ।
- नियम पाँच हैं: शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर - प्रणिधान ।
मुझे यज्ञ और तपका भोक्ता, समस्त लोकोंका महेश्वर तथा भूतमात्रका हित करनेवाला जानकर (उक्त मुनि) शान्ति प्राप्त करता है ।
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टिप्पणी : कोई यह न समझे कि यह श्लोक इस अध्यायके १४वें तथा १५वें श्लोकों और ऐसे ही दूसरे श्लोकोंका विरोधी है। ईश्वर सर्व-शक्तिमान है, इसलिए वह कर्त्ता-अकर्त्ता, भोक्ता अभोक्ता जो कहो सो है और नहीं भी है। वह अवर्णनीय है । वह मनुष्यकी भाषासे परे है। इसलिए उसमें परस्पर-विरोधी गुणों और शक्तियोंका भी आरोपण करके मनुष्य उसकी झांकी करनेकी आशा रखता है ।
ॐ तत्सत्
जो ब्रह्मविद्या भी है और योगशास्त्र भी है श्रीभगवान द्वारा गाये गये ऐसे इस उपनिषद् में आये हुए श्रीकृष्ण तथा अर्जुनके संवादका 'कर्म-संन्यास-योग' नामक पाँचवाँ अध्याय यहाँ समाप्त होता है ।
अध्याय ६
ध्यानयोग
इस अध्याय में योग साधनेके अर्थात् समत्व सिद्ध करनेके कुछ साधन बताये गये हैं ।
जो मनुष्य कर्मफलका आश्रय लिये बिना विहित कर्म करता है; वह संन्यासी भी है और योगी भी है । जो अग्निका अर्थात् अग्निहोत्रका और दूसरी सारी क्रियाओंका त्याग कर देता है वह मनुष्य नहीं ।
१
टिप्पणी : यहाँ विहितका अर्थ है कर्त्तव्यके रूपमें प्राप्त हुआ (सत्कर्म) । अग्निका अर्थ है साधन मात्र । जब अग्निके द्वारा होम होता था तब अग्निकी आवश्यकता रहती थी। संन्यासी होम नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्हें निरग्नि कहा जाता था । मान लीजिए कि आजके युगमें चरखा सेवाका साधन है, तो चरखेका त्याग करके कोई संन्यासी नहीं हो सकता । हे पाण्डव ! जिसे संन्यास कहा जाता है, उसे तू योग समझ । जिसने मनके संकल्पोंका त्याग नहीं किया है, वह कभी योगी नहीं हो सकता ।
२
योग साधनेवाले मनुष्यके लिए कर्म साधन है; जिसने योग सिद्ध कर लिया है, उसके लिए उपशम अर्थात् विरति, शान्ति ही साधन होती है ।
३