सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/१७२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१३४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

उत्तरायणके छः महीनोंमें, शुक्लपक्षमें, दिनमें जिस समय अग्निकी ज्वालाएँ उठ रही हों उस समय, जिनकी मृत्यु होती है, वे ब्रह्मको जाननेवाले मनुष्य ब्रह्मको प्राप्त करते हैं।

२४

दक्षिणायनके छः महीनोंमें, कृष्णपक्षमें, रातमें, जब धुआँ फैला हुआ हो उस समय मरनेवाले मनुष्य चन्द्रलोकको प्राप्त करके पुनर्जन्म पाते हैं ।

२५

टिप्पणी :ऊपरके दो श्लोकोंके शब्दार्थका गीताकी शिक्षाके साथ मेल नहीं बैठता । उस शिक्षाके अनुसार तो जो भक्तिभावसे परिपूर्ण है, जो सेवा-मार्गका अनुसरण करता है और जिसे ज्ञान हो गया है, वह किसी भी समय क्यों न मरे उसे मोक्ष ही प्राप्त होता है । इन दो श्लोकोंका शब्दार्थ गीताकी इस शिक्षाके विरुद्ध है ।

इन श्लोकोंका भावार्थ यह जरूर निकल सकता है कि जो लोग यज्ञ करते हैं अर्थात् जो परोपकारमें ही जीवन बिताते हैं, जिन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया हैं, जो ब्रह्म- विद् अर्थात् ज्ञानी हैं, उनकी मृत्युके समय भी यदि ऐसी स्थिति रहे तो वे मोक्षको प्राप्त करते हैं । इसके विपरीत, जो यज्ञ नहीं करते, जिन्हें ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, जो भक्तिको नहीं जानते, वे चन्द्रलोकको अर्थात् क्षणिक लोकको प्राप्त करके पुनः संसारके चक्र में लौट आते हैं। चन्द्रके पास उसका अपना प्रकाश नहीं होता ।

जगत में प्रकाशका और अन्धकारका, अर्थात् ज्ञानका और अज्ञानका मार्ग - ये दो अत्यन्त प्राचीन कालसे चलते आये शाश्वत मार्ग माने गये हैं। इनमें से एक मार्गसे अर्थात् ज्ञानके मार्ग से मनुष्य मोक्षको प्राप्त करता है; और दूसरे मार्गसे अर्थात् अज्ञानके मार्गसे वह बार-बार पुनर्जन्म प्राप्त करता है ।

२६

हे पार्थ! इन दोनों मार्गोंको जाननेवाला कोई भी योगी मोहमें नहीं पड़ता । इसलिए हे अर्जुन ! तू सदा योगयुक्त रहना ।

२७

टिप्पणी : यहाँ मोहमें न पड़नेका अर्थ यह है कि दोनों मार्गोंको जाननेवाला और समभाव रखनेवाला योगी अन्धकारका अज्ञानका मार्ग नहीं लेगा ।

यह वस्तु जान लेनेके बाद योगी पुरुष वेदोंमें, यज्ञमें, तपमें तथा दानमें जो सबको पार करके उत्तम आदिस्थानको प्राप्त करता पुण्यफल कहा गया है, उस है ।

२८

टिप्पणी : इसलिए जिसने ज्ञान, भक्ति और सेवा कार्यसे समभाव प्राप्त कर लिया उसे सारे पुण्योंका फल मिल जाता है; इतना ही नहीं, परन्तु उसे परम मोक्षपद प्राप्त होता है ।

ॐ तत्सत्

जो ब्रह्मविद्या भी है और योगशास्त्र भी है श्रीभगवान द्वारा गाये गये ऐसे इस उपनिषद् में आये हुए श्रीकृष्ण तथा अर्जुनके संवादका 'अक्षर ब्रह्मयोग' नामक आठवाँ अध्याय यहाँ समाप्त होता है ।