१४४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय इसलिए तू उठ, कीर्तिको प्राप्त कर और शत्रुओंको जीतकर धन-धान्यसे समृद्ध राज्यका उपभोग कर। इन सबको मैंने पहलेसे हो मार डाला है । हे सव्यसाची ! तू केवल निमित्त - मात्र बन जा । मेरे हाथों मरे हुए द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा दूसरे योद्धाओंको तू (केवल नामके लिए ही) मार । तू घबरा मत; युद्धमें लड़। रणमें तू शत्रुओंको निश्चित रूपसे जीतनेवाला है । संजय बोले : ३४ केशव के ये वचन सुनकर मुकुटधारी अर्जुनने काँपते हुए, हाथ जोड़कर, बार- बार नमस्कार करते हुए, पुनः डरते-डरते, प्रणाम करके गद्गद कण्ठसे कृष्णसे इस प्रकार कहा । अर्जुन बोले : ३५ हे हृषीकेश ! आपका कीर्तन करके जगतको हर्ष होता है तथा आपके विषयम उसे अनुराग पैदा होता है, यह ठीक ही है । डरे हुए राक्षस इधर-उधर भागते हैं और सिद्धोंका सारा समूह आपको नमस्कार करता है । (यह भी ठीक ही है ।) ३६ हे महात्मन् ! आपको वे नमस्कार क्यों न करें ? आप ब्रह्मसे भी बड़े आदि- कर्त्ता हैं । हे अनन्त ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप अक्षर-अविनाशी हैं, सत् हैं, असत् हैं और इनसे जो कुछ परे है वह भो आप ही हैं ? ३७ आप आदिदेव हैं। आप पुराण पुरुष हैं । आप इस विश्वके परम आश्रय स्थान । आप वेत्ता - जाननेवाले भी हैं, और वेद्य - जानने योग्य मो हैं । आप परमधाम हैं । है अनन्तरूप ! इस जगत् में आप सर्वत्र व्याप्त हैं । ३८ आप ही वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्र, प्रजापति और प्रपितामह हैं। आपको मेरे हजारों बार नमस्कार हैं । फिर एक बार और भी आपको मेरे नमस्कार हैं । ३९ हे सर्व ! आपका आगेसे, पोछेसे, सब ओरसे मेरा नमस्कार है । आपका वीर्य, आपकी शक्ति अनन्त है । आपका पराक्रम अपार है । आप ही सबको व्याप्त किये हुए हैं । इसलिए आप सर्व हैं । ४० आपकी यह महिमा न जाननेके कारण मित्र मानकर 'हे कृष्ण ! हे यादव ! हे सखा ! इस प्रकार आपको पुकारनेमें मुझसे भूलेमें या प्रेममें भी जो अविवेक हुआ हो और विनोदार्थ भी खेलते, सोते, बैठते या खाते हुए अकेले में अथवा बहुत लोगोंके बीच मुझसे आपका जो भी अपमान हुआ हो, उसे क्षमा करनेकी, हे अगम्य- रूप ! आपसे मैं प्रार्थना करता हूँ । ४१-४२ आप स्थावर और जंगम जगतके पिता हैं । आप उसके पूज्य और श्रेष्ठ गुरु हैं । हे अनुपम प्रभाववाले ! आपके समान भी जब कोई नहीं है, तब आपसे अधिक तो कोई हो ही कैसे सकता है ? ४३ इसलिए साष्टांग प्रणाम करके आप पूज्य ईश्वरसे मैं प्रसन्न होनेकी प्रार्थना करता हूँ। जैसे पिता अपने पुत्रको, मित्र अपने मित्रको सहन करता है, उसी प्रकार आप मेरे प्रिय होनेके कारण मेरे कल्याणके लिए कृपया मुझे सहन करें । ४४
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/१८२
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