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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/१९०

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१५२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय इन गुणों में सत्वगुण निर्मल होनेके कारण प्रकाशित करनेवाला तथा स्वास्थ्यप्रद है, और हे अनघ ! वह देहीकी सुखमें और ज्ञानमें आसक्ति पैदा करके उसे बांधता है । ६ हे कौन्तेय ! रजोगुण अनुराग-रूप होने के कारण तृष्णा और आसक्तिकी जड़ है; वह देहधारीको कर्मपाशमें बाँधता है । हे भारत ! तमोगुण अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला है, इसलिए वह समस्त देह- धारियोंको मोह में डालता है और देहीको असावधानता (प्रमाद), आलस्य तथा निद्राके पाशमें बाँधता है । ८ हे भारत ! सत्वगुण आत्माका शान्तिसुखके साथ संयोग कराता है, रजोगुण कर्मके साथ आत्माका संयोग कराता है और तमोगुण ज्ञानको ढँककर प्रमादके साथ आत्माका संयोग कराता है । ९ हे भारत ! जब रजस् और तमस् दब जाते हैं तब सत्वगुण ऊपर आता है । सत्व और तमस् दबनेपर रजस् और सत्व और रजस्के दबनेपर तमस् ऊपर आता है । १० जब समस्त इन्द्रियों द्वारा इस देह में प्रकाश और ज्ञानका उद्भव होता है तब यह समझना चाहिए कि सत्वगुणकी वृद्धि हुई है । ११ हे भरतर्षभ ! जब रजोगुणकी वृद्धि होती है तब लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंके आरम्भ, अशान्ति (अतृप्ति) तथा इच्छाका उदय होता है । १२ हे कुरुनन्दन ! जब तमोगुणकी वृद्धि होती है तब अज्ञान, मन्दता, असावधानी तथा मूढ़ता उत्पन्न होती है। १३ जब देहधारी अपने भीतर सत्वगुणकी वृद्धि होने पर मृत्युको प्राप्त होता है, तो वह उत्तम ज्ञानियोंके निर्मल लोकोंको प्राप्त करता है । १४ रजोगुणकी वृद्धि होने पर मृत्यु हो तो देहधारी कर्मसंगियोंके - कर्ममें आसक्त रहनेवाले मनुष्योंके - लोकमें जन्म लेता है; और तमोगुणकी वृद्धि होनेपर मृत्यु पानेवाले देहधारी मूढ़योनिमें जन्म लेता है । १५ टिप्पणी : कर्मसंगियोंका लोक अर्थात् मनुष्य-लोक; और मूढयोनि अर्थात् पशु इत्यादि लोक । सत्कर्मका फल सात्विक और निर्मल होता है, राजसी कर्मका फल दुःख होता है और तामसी कर्मका फल अज्ञान होता है । १६ टिप्पणी : हम साधारण व्यवहारमें जिसे सुख और दुःख मानते हैं, उस सुख-दुःखका उल्लेख यहाँ नहीं समझना चाहिए । यहाँ सुखका अर्थ है आत्मानन्द, आत्मप्रकाश । इससे जो उलटा हो वह दुःख है । १७वें श्लोकमें यह बात स्पष्ट हो जाती है । सत्वगुणसे ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुणसे लोभ उत्पन्न होता है और तमोगुण से असावधानी, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं। १७ सात्विक मनुष्य ऊंचे चढ़ते हैं, राजसी मनुष्य मध्यमें रहते हैं और अन्तिम गुणवाले तामसी लोग अधोगतिको प्राप्त करते हैं। १८