अन्तःकरण में स्थित मुझे भी कष्ट पहुँचाते हैं। ऐसे मनुष्योंको तू आसुरी निष्ठावाला समझ।
५-६
आहार भी मनुष्यको तीन प्रकारका प्रिय होता है। इसी तरह यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकारके प्रिय होते हैं। उनका यह भेद तू सुन।
७
आयु, सात्विकता, बल, स्वास्थ्य, सुख तथा रुचिको बढ़ानेवाले, रसपूर्ण, चिकने, पोषक और चित्तको सन्तोष देनेवाले आहार सात्विक लोगोंको प्रिय होते हैं।
८
तीखे, खट्टे, खारे, बहुत गरम, बहुत चरपरे, रूखे और दाहकारक आहार राजस लोगोंको प्रिय होते हैं, [यद्यपि] वे दुःख, शोक और रोग उत्पन्न करनेवाले होते हैं।
९
पहर-भरसे पड़ा हुआ, बिगड़ा हुआ, दुर्गन्ध-युक्त, रात-भर बासी, जूठा और अपवित्र भोजन तामस लोगोंको प्रिय होता है।
१०
जिसमें फलकी आशा नहीं होती, जो विधिपूर्वक, कर्त्तव्य समझकर और एकाग्र तथा स्थिर मनसे किया जाता है, वह यज्ञ सात्विक है।
११
हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ फलके उद्देश्य से और दम्भसे किया जाता है, उसे तू राजसी यज्ञ जान।
१२
जिस यज्ञमें विधि नहीं होती, अन्नकी उत्पत्ति और तृप्ति नहीं होती, मन्त्र नहीं होता, त्याग नहीं होता और श्रद्धा नहीं होती, वह तामस यज्ञ कहा जाता है।
१३
देव, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीकी पूजा, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा—यह शारीरिक तप कहा जाता है।
१४
किसीको दुःख न दे ऐसा, सत्य, प्रिय तथा हितकारी वचन और धर्मग्रन्थोंका अध्ययन—यह वाचिक तप कहा जाता है।
१५
मनकी प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और भावनाकी शुद्धि— यह मानसिक तप कहा जाता है।
१६
समभावी पुरुष जब फलकी इच्छाका त्याग करके परम श्रद्धाके साथ यह तीन प्रकारका तप करते हैं, तब उसे बुद्धिमान लोग सात्विक तप कहते हैं।
१७
जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिए दम्भसे किया जाता है, वह अस्थिर और अनिश्चित तप राजस कहा जाता है ।
१८
जो तप पीड़ा भोगकर, दुराग्रहसे या दूसरोंका नाश करनेके लिए किया जाता है, वह तामस तप कहा जाता है।
१९
दान देना उचित है ऐसी समझ के साथ तथा बदला मिलनेकी आशा रखे बिना देश, काल और पात्रको देखकर जो दान दिया जाता है, वह सात्विक दान कहा जाता है।
२०
जो दान बदला पानेके लिए अथवा फलकी आशा रखकर और दुःखके साथ दिया जाता है, वह राजसी दान कहा जाता है।
२१
जो दान गलत स्थानपर, कुसमय में और अपात्रको दिया जाता है अथवा सम्मान के बिना, तिरस्कारपूर्वक दिया जाता है, वह दान तामसी कहा जाता है।
२२