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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/२०२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

जो आसक्ति और अहंकारसे रहित है, जिसमें दृढ़ता और उत्साह है और जो सफलता तथा असफलता में हर्ष या शोक नहीं करता, वह सात्विक कर्त्ता कहलाता है।

२६

जो रागी है, कर्मके फलकी इच्छा रखनेवाला है, लोभी है, हिंसा करनेवाला है, मलिन मनवाला है तथा हर्ष और शोक करनेवाला है, वह राजस कर्त्ता कहा जाता है।

२७

जो अव्यवस्थित, असंस्कारी, घमण्डी, धूर्त, दुष्ट, क्रूर, आलसी, शोकयुक्त और दीर्घसूत्री है, वह तामस कर्त्ता कहा जाता है।

२८

हे धनंजय! अब मैं गुणोंके अनुसार बुद्धि तथा धृतिके, विस्तारसे और अलग-अलग, तीन प्रकार बताता हूँ। उन्हें तू सुन।

२९

जो बुद्धि समुचित रूपमें प्रवृत्ति और निवृत्ति, कार्य और अकार्य, भय और अभय तथा बन्धन और मोक्षका भेद जानती है, वह सात्विकी बुद्धि है।

३०

जो बुद्धि धर्म तथा अधर्मका और कार्य तथा अकार्यका विवेक अशुद्ध—गलत—रीतिसे करती है, वह बुद्धि हे पार्थ! राजसी है।

३१

हे पार्थ! जो बुद्धि अन्धकारसे घिरी हुई होनेके कारण अधर्मको ही धर्म मानती है और सारी बातोंको उलटी ही दृष्टिसे देखती है, वह बुद्धि तामसी है।

३२

जिस एकनिष्ठ धृतिसे मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको साम्यबुद्धिसे धारण करता है, वह धृति हे पार्थ! सात्विकी है।

३३

हे पार्थ! जिस धृतिके द्वारा मनुष्य फलाकांक्षी होकर धर्म, अर्थ और कामको आसक्तिपूर्वक धारण करता है, वह धृति राजसी है।

३४

जिस धृतिसे दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य निद्रा, भय, शोक, खेद और मदको छोड़ नहीं सकता, हे पार्थ! वह तामसी धृति है।

३५

हे भरतर्षभ! अब तू मुझसे तीन प्रकारके सुखका वर्णन सुन।

अभ्यास से जिसमें मनुष्य आनन्दित होता है, जिससे उसके दुःखका अन्त होता है, जो आरम्भमें विष-तुल्य लगता है और परिणाममें अमृत जैसा सिद्ध होता है तथा जो आत्मज्ञानकी प्रसन्नतासे उत्पन्न होता है, वह सुख सात्विक कहलाता है।

३६-३७

विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे जो सुख आरम्भमें अमृत—जैसा लगता है, परन्तु परिणाम में जहर जैसा सिद्ध होता है, वह सुख राजस कहलाता है।

३८

जो सुख आरम्भ में और परिणाम में आत्माको मोहमें डालनेवाला है और निद्रा, आलस्य तथा प्रमादसे उत्पन्न हुआ है, वह तामस सुख कहलाता है।

३९

पृथ्वीपर अथवा स्वर्ग में देवोंके बीच ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न हुए इन तीन गुणोंसे मुक्त हो।

४०

हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके कर्मोंके भी उनके स्वभाव-जन्य गुणोंके कारण विभाग किये गये हैं।

४१

शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, अनुभवसे उत्पन्न विज्ञान और आस्तिकता——ये ब्राह्मणके स्वभावजन्य कर्म हैं।

४२