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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/२०४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

तू मनसे समस्त कर्मोंको मुझमें अर्पण करके, मुझमें लीन होकर, विवेक-बुद्धिका आश्रय लेकर सदा मुझमें अपने चित्तको लगाये रख।

५७

मुझमें चित्तको लीन करनेसे तू कठिनाइयों रूपी सारे पर्वतोंको मेरी कृपासे लाँघ जायेगा। लेकिन यदि तू अहंकारके वश होकर मेरी बात नहीं सुनेगा, तो नाश को प्राप्त होगा।

५८

तू अहंकारके वश होकर यदि यह माने कि 'मैं नहीं लड़ूँगा' तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है। तेरा स्वभाव ही तुझे युद्धकी ओर बलपूर्वक घसीट कर ले जायेगा।

५९

हे कौन्तेय! अपने स्वभाव-जन्य कर्मसे बँधा हुआ तू मोहके वश होकर जो कार्य नहीं करना चाहता, उसे तू विवश होकर करेगा।

६०

हे अर्जुन! ईश्वर सब प्राणियोंके हृदयमें वास करता है; और अपनी मायाके प्रतापसे उन्हें कुम्हारके चक्र पर चढ़े हुए घड़ेकी तरह गोल-गोल घुमाता है।

६१

हे भारत! तू सच्ची भावनासे उसीकी शरण ले। उसकी कृपासे तू परम शान्तिमय अमर-पदको प्राप्त करेगा।

६२

इस प्रकार मैंने तुझसे यह गुह्यसे गुह्य ज्ञान कहा है। इस सबपर अच्छी तरह विचार करके तुझे जैसा उचित लगे वैसा कर।

६३

इसके अतिरिक्त, तू सबसे अधिक रहस्यमय मेरा परम वचन सुन। तू मुझे अत्यन्त प्रिय है, इसलिए मैं तेरे हितकी बात तुझसे कहूँगा।

६४

तू मुझसे लौ लगा, मेरा भक्त बन, मेरे लिए यज्ञ कर, मुझे प्रणाम कर। तू मुझे ही प्राप्त करेगा, यह मेरी सत्य प्रतिज्ञा है। तू मुझे प्रिय है।

६५

सब धर्मोंका त्याग करके तू केवल मेरी ही शरण ले। मैं तुझे सारे पापोंसे मुक्त करूँगा। तू शोक मत कर।

६६

जो मनुष्य तपस्वी नहीं है, जो भक्त नहीं है, जो सुनना नहीं चाहता और जो मुझसे द्वेष या ईर्ष्या करता है, उससे तू यह (ज्ञान) कभी मत कहना।

६७

परन्तु जो मनुष्य यह परम गुह्य ज्ञान मेरे भक्तोंको देगा, वह मेरी परम भक्ति करनेके कारण निश्चित रूपसे मुझे ही प्राप्त करेगा।

६८

मनुष्योंमें उसकी अपेक्षा मेरा कोई अधिक प्रिय सेवक नहीं है और इस पृथ्वी पर उससे अधिक प्रिय कोई मेरा होनेवाला भी नहीं है।

६९

टिप्पणी: यहाँ कहनेका आशय यह है कि इस ज्ञानका जिसने अनुभव किया है, वहीं मनुष्य इसे दूसरोंको दे सकता है। जो मनुष्य केवल शुद्ध उच्चारण करके दूसरोंको यह ज्ञान अर्थ-सहित सुना भर दे, ऊपरके दो श्लोक उसके लिए नहीं हैं।

हमारे बीचके इस धार्मिक और पवित्र संवादका जो मनुष्य अध्ययन करेगा, वह मुझे ज्ञान-यज्ञके द्वारा भजेगा, ऐसा मेरा मत है।

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इसके अतिरिक्त, जो मनुष्य द्वेष-रहित होकर श्रद्धासे इस संवादको केवल सुनेगा, वह भी पापमुक्त होकर उस शुभ लोकको प्राप्त करेगा जहाँ पुण्यवान रहते हैं।

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