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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/२२६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

लोग इसके आशयको आत्मसात् कर लेंगे, तब यह किसी न किसी रूपमें रिसकर अनपढ़ोंके समाज तक भी पहुँच जायेगा और इससे वह वातावरण बन सकेगा जिससे आजाद हो जानेके बाद भारतको नीति निर्धारणका आधार तैयार होगा...।

मैं एल॰ ई॰ के इस लेखको सहर्ष प्रकाशित कर रहा हूँ और इस बातको माननेमें कोई कठिनाई महसूस नहीं करता कि अधिकांश हस्ताक्षर करनेवालोंकी नीतिमें प्रामाणिकताका सुस्पष्ट अभाव होने पर भी केलॉग समझौतेकी सम्भावनाएँ बहुत हैं। एल॰ ई॰ ने 'यंग इंडिया' को पत्र लिखनेवाले जिस सम्बन्धित संवाददाताका उल्लेख किया है उसके द्वारा समझौतेके सम्बन्धमें व्यक्त आशंकाको तो मैं भी पूरी तरह स्वीकार करता हूँ। किन्तु कुछ लोगोंके प्रयत्नोंमें प्रामाणिकताका अभाव मुझे अधिक परेशान नहीं करता। मेरी कठिनाई एल॰ ई॰ के सुझावके उस भागसे सम्बन्धित है जिसमें शान्तिका वातावरण विस्तृत करनेके लिए भारत के योगदानकी चर्चा है। परिस्थितिवश शान्ति स्थापनामें भारतका योगदान पश्चिमी राष्ट्रोंकी अपेक्षा भिन्न प्रकारका होगा। भारत स्वतन्त्र राष्ट्र नहीं है। और उसकी वर्तमान स्थितिसे यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि स्वतन्त्र होनेकी संकल्पशक्ति भी उसके पास नहीं है। समझौतेके सहयोगियोंमें अधिकांश वे लोग हैं जो एशिया और आफ्रिकाके निवासियोंके शोषणमें साझीदार हैं। भारतीय जनता इन सबसे अधिक शोषित है। इस तरह शान्ति समझौतेका मूल अभिप्राय संयुक्त रूपसे होनेवाले शोषण कार्यको निर्विघ्न चलते रहने देना है। कमसे कम इस समय तक तो समझौता मुझे ऐसा ही मालूम देता है। भारतने कभी किसी देश पर हमला नहीं किया। उसने एकाध बार केवल आत्मरक्षाके लिए असंगठित अथवा अर्ध-संगठित ढंगसे विरोध किया है। इसलिए शान्तिकी आकांक्षा विकसित करनेकी उसे आवश्यकता नहीं है। वह तो उसमें काफी है; उसे चाहे इसका भान हो, चाहे नहीं। अपने शोषणका शान्तिपूर्ण ढंगसे विरोध करके ही वह शान्तिकी स्थापनामें योगदान कर सकेगा। इसका यह अर्थ हुआ कि उसे शान्तिपूर्ण तरीकोंसे स्वतन्त्र होना चाहिए; इस वर्षकी हदतक हमने स्वतन्त्रताको औपनिवेशिक स्वराज्य कहा है। यदि यह सम्भव हो गया तो संसारमें शान्तिकी स्थापनाके लिए किसी भी राष्ट्रके द्वारा किया गया वह बड़ेसे बड़ा योगदान होगा। यदि मेरा निदान सही है तो एल॰ ई॰ स्कूलोंमें जिस प्रकारकी शिक्षा चाहते हैं वह तो प्रभावशून्य और इससे भी बुरी यानी पाखण्डपूर्ण होगी। इसे पढ़ानेकी बात अध्यापकोंके गले उतर जाये तो भी सम्बन्धित सिद्धान्त कक्षाके लड़के-लड़कियोंके गले कदापि नहीं उतर सकता। ऐसा व्यक्ति जिसने कभी मक्खीको भी नहीं सताया, कभी रक्तपात न करनेका निश्चय लेनेकी अपीलके उद्देश्यको नहीं समझ पायेगा।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, ४-७-१९२९