जा सके और वह लोकप्रिय हो जाये, तो बहिष्कार सम्भव है। जिस तरह ये मिल-मालिक हमारे विचारोंसे सहमत हुए, उसी तरह और भी अनेक मिल-मालिक हमसे सहमत हैं। अगर कांग्रेस के कार्यकर्त्ता मिलके कपड़ोंको खपानेका काम करने लगें तो बहिष्कारमें रुकावट पैदा हो, और इस अविचारपूर्ण कार्रवाईके फलस्वरूप मिलोंको आखिर नुकसान ही उठाना पड़े। पाठकोंको समझना चाहिए कि आन्दोलनके बार-बार असफल होनेसे निराशा बढ़ती है, और किसी दिन ऐसा हो सकता है कि लोग कपड़ेकी खरीदीके सम्बन्धमें विचार करना ही छोड़ दें। ऐसे समय तो चाहे जैसी जोखिम उठाकर भी हमें आन्दोलनको नाकामयाबीसे बचाना चाहिए। जहाँ-जहाँ मनके प्रमाद और अपूर्णताके कारण होनेवाली भूलोंकी जोखिमसे बचा जा सकता है, वहाँ-वहाँ उससे बचना चाहिए। विदेशी कपड़ोंका व्यापारी जन-साधारणकी उदासीनताके बलपर अपना उल्लू सीधा कर लेता है। जिस दिन लोग बुद्धिसे काम लेने लगेंगे उस दिन बहिष्कारके सफल होनेके सम्बन्धमें कोई शंका नहीं बच रहेगी। देशी मिलें अपना काम कर रही हैं, यही नहीं बल्कि कांग्रेसकी सहायताके बिना भी वे बहिष्कार-आन्दोलनसे पूरा-पूरा लाभ उठा रही हैं।
अब मैं पहले प्रश्न पर आता हूँ। मिल-मालिक चाहें तो वे बहिष्कार-आन्दोलनकी भरपूर मदद कर सकते हैं। उनसे पिछले साल पण्डित मालवीयजी, पण्डित मोतीलालजी और मैंने सक्रिय मदद पानेका प्रयत्न किया था। लेकिन वह निष्फल हुआ। इसका कारण शायद यह हो कि जिस आन्दोलनको सरकारका समर्थन न हो, या जिसे सरकार मन ही मन नापसन्द करती मालूम पड़ती हो, मिल-मालिकोंके लिए उसमें कांग्रेसके ढंगसे शामिल होना स्वभावतया ही अशक्य था। इनमें से बहुतेरे तो सरकारी प्रभुत्वमें रहनेवाले बैंकों पर निर्भर रहते हैं। फिर भी अगर देशमें ऐसी मिलें हों, जो सरकारकी ओरसे डाले गये, चाहे जैसे छिपे हुए दबावके खिलाफ काम कर सकती हों, तो वे आन्दोलनमें नीचे लिखे ढँगसे प्रत्यक्ष हाथ बँटा सकती हैं:
१. वे अपनी एजेंसियों द्वारा खादी बेच सकती हैं;
२. वे बहिष्कार आन्दोलनको अपनी बुद्धिका लाभ दे सकती हैं;
३. बहिष्कारकी दृष्टिसे वे अखिल भारत चर्खा-संघके साथ विचार-विमर्श करके यह तय कर सकती हैं कि कौन-सा कपड़ा तैयार करना और कौन-सा नहीं;
४. वे खादीका नाम देकर या किसी दूसरे ढंगसे मिलकी खादी बनाना बन्द कर सकती हैं;
५. कपड़े का भाव इस तरह निश्चित कर सकती हैं कि जिसमें न तो उन्हें नुकसान ही हो और न वे बहुत मुनाफा ही कमायें;
६. फिर वे बहिष्कारके काममें आर्थिक सहायता दे सकती हैं।
इन छः मुख्य बातोंमें से और भी कई दूसरी बातें निकाली जा सकती हैं। किन्तु मिलें इस तरहकी मदद तो तभी कर सकती हैं, जब मिल-मालिकों और उनके भागीदारोंके हृदयमें देश-प्रेमकी आग जलती हो और वे मुनाफेकी कोई सीमा बाँध लें। मुझे विश्वास है कि अगर भागीदारोंके सामने सचाईसे मुद्देकी बातें पेश की जायें