अन्यत्र दिये हुए संक्षिप्त बयान सच ही हैं या नहीं, इस पर मैं यहाँ विचार करना नहीं चाहता। अगर उनमें कोई अतिशयोक्ति है, तो सरकारी अधिकारी उसे सुधारें, जो सुधार वे भेजेंगे, मैं उसे छापनेके लिए तैयार रहूँगा। मगर मैं इतना तो जानता हूँ कि संक्षिप्त बयानोंमें उल्लिखित जुल्मोंसे भी ज्यादा जुल्म हुए हैं, होते हैं, अतएव ऐसे अत्याचार किये भी गये हों तो कोई आश्चर्य नहीं।
इस लेखका उद्देश्य तो यही बताना है कि सैकड़ों बारडोलियोंके होते हुए भी जहाँके लोग डरपोक बने रहेंगे, वहाँ अत्याचारी भी मिलते ही रहेंगे। यह दूसरी बात है कि अत्याचारी सरकारी व्यक्ति हैं या गैर-सरकारी। गैर-सरकारी जुल्म भी लोगोंको कुछ कम नहीं सहने पड़ते हैं। अतएव स्वयंसेवकोंका कर्त्तव्य है कि वे सर्व-साधारणको हिम्मतका पाठ सिखायें। लोगोंको चाहनेपर भी सर्वत्र वल्लभभाई-जैसे सरदार तो मिल नहीं सकते। इसलिए सभी स्वयंसेवकोंको वल्लभभाईके गुण सम्पादन करनेका प्रयत्न करना चाहिए। उनके-जैसी बुद्धि सबको नहीं मिल सकती; मगर उनकी-सी हिम्मत तो जो चाहे वही प्राप्त कर सकता है और उनकी तरह आठों पहर जागरूक भी जो चाहे वही रह सकता है। अगर ये दो बातें हों तो बस है।
लोग देते रहेंगे, तबतक सरकार लगान वसूल करती ही रहेगी। अगर सरकार 'वर मरे, कन्या मरे, गोरका[१] घर भरे' वाली बातका अनुसरण न करे तो उसका राज्य न चले। सरकारका अलिखित नियम तो यही है कि लोग मरें या जियें, लगान तो वसूल किया ही जाना चाहिए। यह या ऐसे अन्य अलिखित नियमोंको धो-पोंछनेका दूसरा नाम स्वराज्य है। लगान या कर सल्तनतकी सत्ताकी बुनियाद है। जनताकी दृष्टिसे यह बुनियाद ही झूठी है। एक नहीं अनेक बार यह साबित हो चुका है कि जो लगान वसूल किया जाता है, उसे जमा करनेकी लोगोंमें ताकत नहीं है। मगर जिस पद्धतिसे राज्यतन्त्र चल रहा है, उसे निबाहनेके लिए तो जितना कर वसूल किया जाता है वह भी नाकाफी है। अतएव अधिकारी दिन-रात इसी विचारमें अपनी बुद्धि खपाते रहते हैं कि लगान कैसे बढ़ाया जाये। प्रजाके हाथमें सत्ता आ जानेपर भी अगर यही रफ्तार रही तो इतना ही लगान वसूल करना पड़ेगा और रियाया पर ऐसे ही जुल्म होते रहेंगे। इसीसे मैं पुकार-पुकार कर कह चुका हूँ कि इस पद्धतिको बदलना स्वराज्यकी एक व्याख्या है। इस पद्धतिको पलटनेके लिए, जो लगान अन्यायपूर्ण साबित हो चुका है, उसे जमा न करनेकी कला लोगोंको सोखनी पड़ेगी। यानी अभ्यास और अनुभवसे यह सिद्ध करना पड़ेगा कि लगान अन्यायपूर्ण है, इतने पर भी अगर घर-बार बिक जायें, जेल जाना पड़े या दूसरे उपद्रव किये जायें तो भी अन्यायपूर्ण लगान जमा न करनेके निश्चयपर अटल रहना चाहिए।
मगर आम रियायाको यह चीज कौन सिखाये? स्वयंसेवकगण विभिन्न गाँवोंमें जमकर बैठें, गाँववालोंकी सेवा करें, उनका विश्वास सम्पादन करें, उनके सुख-दुःख जानें, उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थितिका अभ्यास करें और धीरे-धीरे अपनी हिम्मतको छाप उनपर डालें। अगर बारडोलीमें पहलेसे ही ऐसा काम न हुआ होता,
- ↑ उपाध्याय-पुरोहित।