११६. पत्र: प्रभावतीको
मौनवार [८ जुलाई, १९२९][१]
हम आरामसे शनिवारकी रात आश्रम वापस पहुँच गये। मेरा वजन दो रतल बढ़ गया है। अभी बिना पकाया भोजन ही ले रहा हूँ। खाँसी दूर हो गई या नहीं? जयप्रकाशके आनेमें देरी है। इसलिए मैंने राजेन्द्रबाबूसे कहा है कि वे तुम्हें यहाँ वापस भिजवा दें तो 'गीता' और अंग्रेजीका और अभ्यास करा दूँ। यदि पिताजी आज्ञा दें और इच्छा हो तो तुरन्त आ जाना। मुझे तो अच्छा लगेगा।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी॰ एन॰ ३३४७) की फोटो-नकलसे।
११७. अलमोड़ाके अनुभव
आतिथ्य
जब किसी पर हर जगह गहरा प्रेम प्रकट किया जाता है और उसकी बड़ी फिक्र की जाती है, तब उस प्रेम और चिन्ताकी अलग-अलग कीमत आँकना मुश्किल हो जाता है। मैंने सोचा था कि इस विषयमें आन्ध्रदेशकी बराबरी कोई न कर सकेगा। लेकिन आन्ध्रके बाद शीघ्र ही अलमोड़ामें जो अनुभव प्राप्त हुए उन्होंने मुझे इस धारणामें परिवर्तन करनेको विवश कर दिया। अलमोड़ा किसीसे पीछे नहीं रहा। मेरी हिमालयकी सुन्दर पर्वतमालाओंको इने-गिने दिनोंकी यात्राको अलमोड़ाके मित्रोंने अधिकसे-अधिक सुखकर बनानेमें कोई बात उठा नहीं रखी थी। एक बातमें वे आन्ध्रसे भी बाजी ले गये। उन्होंने, अनेक थैलियोंके रूपमें जो चन्दा इकट्ठा हुआ था, उसमें से स्वागतका खर्चा नहीं काटा। मोटरका तमाम जबरदस्त खर्च कुछ मित्रोंने खानगी तौरसे उठा लिया। समितिने उन लोगोंका खर्चा उठाना भी मंजूर नहीं किया, जो मेरे साथ यात्रामें होते हुए भी कर्मचारियोंमें से नहीं थे, और जो अपना खर्च स्वयं दे सकते थे। आखिरी निर्णयके तौरपर यह कह दिया गया था कि "अगर देना ही है तो खादी-निधिके लिए जो चाहे सो दिया जा सकता है।" अलमोड़ाके उदार आतिथ्यका बखान यहीं समाप्त कर देना अच्छा है। इन पहाड़ियोंपर प्रकृतिके आतिथ्यके आगे मनुष्यकी सारी आतिथ्य भावना पानी भरती है। हिमालयका मनमोहक सौन्दर्य, सुखद जलवायु और आँखोंको आनन्द पहुँचानेवाली चारों ओरकी हरियालीको
- ↑ गांधीजीके बिना पकाये भोजनके प्रयोग और आश्रम वापस पहुँचनेके उल्लेखसे।