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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/२४८

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१२०. सिलहटका जलप्रलय

जब मैं कौसानीमें था तब मुझे पहले-पहल[] स्थानीय कांग्रेस समितिके अध्यक्षसे सिलहट घाटीकी भीषण बाढ़के समाचार मिले थे। मामूली तौर पर भी भारतके इस प्रदेश-विशेषमें बरसात भयंकर ही होती है, मगर मेरे सामने पड़े हुए अखबारोंसे मुझे पता चल रहा है कि जैसी बाढ़ इस बार आई है, कभी पहले वैसी आनेकी बात किसीको याद नहीं पड़ती। बाढ़के कारण जिस इलाकेको क्षति पहुँची है उसका क्षेत्रफल ५,५०० वर्गमील है और उसकी आबादी १८ लाख है। इस बाढ़ के कारण धन और जनकी जो भीषण हानि हुई है, उसका यहाँ उल्लेख करना आवश्यक नहीं है; दैनिक पत्रोंमें विस्तारसे इसपर चर्चा हो चुकी है। मेरे पास कमसे-कम चार समितियोंने तार और पत्र भेजकर सहायता की माँग की है। इनमेंसे एक श्री सुभाष बोसकी ओरसे मिली है और उसमें डा॰ प्र॰ चं॰ रायकी अध्यक्षतामें एक केन्द्रीय संकट-निवारण समितिकी स्थापना की बात कही गई है। इस बाढ़के कारण धन और जनकी जो हानि हुई है, उसे स्वयं देखने, समझनेके लिए श्री अमृतलाल ठक्कर रवाना हो गये हैं।

गुजरात तो अभी-अभी ऐसी बाढ़का स्वयं अनुभव कर चुका है, इसलिए वह असमके कष्टकी कल्पना कर सकता है। दयालु और देशभक्त व्यक्ति ऐसे सवाल कभी नहीं कर सकता: "अगर रोज-रोज बाढ़ें आयें और अकाल पड़ें तो कोई रोज-रोज दान कहाँ तक दे सकता है? इतना है ही किसके पास? अगर इस तरह दान देने पड़ें तो कुबेरका भण्डार भी खाली हो जाये।" जब तक हम खा रहे हैं तब तक जो भूखा है उसे हमसे लेनेका अधिकार है। यदि इसे एक प्रमाण-वाक्य मान लिया जाये तब फिर अपनी नित्यकी जरूरतसे जिसके पास कुछ अधिक है वह माँगे जाने पर बाढ़ आदिसे पीड़ित लोगोंकी मददके लिये देनेसे इनकार नहीं कर सकता।[]

जिन्होंने अबतक बाढ़ सहायताके लिए कुछ नहीं दिया है, उनसे मैं प्रार्थना करता हूँ कि वे अपनी दानकी रकम भेजें। दाताओंकी ओरसे जो-कुछ मुझे मिलेगा उसके बल पर अधिकसे अधिक संकट-ग्रस्तोंके संकट निवारणका प्रयत्न किया जायेगा। ऐसी आकस्मिक दुर्घटनाओंके अवसर पर पहले आघातके खत्म होनेके तत्काल बाद मिलनेवाली सहायता ही स्वागतके योग्य होती है। ऐसे अवसरों पर तात्कालिक सहायता तो सर्वनाश द्वारा प्रकृति स्वयं ही कर देती है। जो लोग अपनी दुःख-गाथा सुनानेको पीछे रह जाते हैं, मनुष्य अपनी सहानुभूति द्वारा उनके सन्तापको शीतल करता है।

  1. देखिए "तार: करीमगंज कांग्रेस कमेटीके अध्यक्षको", २२-६-१९२९।
  2. यह अनुच्छेद नवजीवनमें १५-७-१९२९ को प्रकाशित "आसाममां जलप्रलय" शीर्षक लेखसे लिया गया है।