दोको छोड़कर सभी भारतीयोंने जी भर कर 'शेम्पेन' पी। जब शैतान स्वतन्त्रता, सभ्यता, संस्कृति, आदिके समर्थकका रूप लेकर सामने आता है तो वह लगभग दुनिवार्य बन जाता है। इसलिए यह अच्छा ही है कि नशाबन्दी कांग्रेसके कार्यक्रमोंकी पूर्णताका एक आवश्यक अंग है।
यंग इंडिया, ११-७-१९२९
१२२. काशीकी पण्डित-सभा
जब मैं काशीजीमें था, मेरे पास काशी-पण्डित-सभाकी तरफसे तीन प्रश्न भेजे गये थे। उन प्रश्नोंके उत्तर देना मैंने अपना धर्म समझा था। परन्तु उस समय मुझे अवकाश नहीं था और वे प्रश्न मेरे दफ्तरमें पड़े रहे। भ्रमणमें मैं उन्हें हाथमें नहीं ले सका। अब जब कि दफ्तरमें पड़ा काम निबटा रहा हूँ, उक्त प्रश्न मेरे सामने हैं, और वे इस प्रकार हैं:
१. श्रुतियों तथा श्रुति-सम्मत स्मृतियोंको अभ्रान्त प्रमाण माननेवाला एक सनातनधर्मी धर्मशास्त्रज्ञ "दैवयात्रा विवाहेषु संकटे राजविप्लवे उत्सवेषुच सर्वेषु स्पर्शास्पर्शो न दुष्यतः" इत्यादि अपवादोंके सिवा अछूतों (चाण्डालादि) के स्पर्श का सर्वदा व सर्वथा किस तरह समर्थन कर सकता है और कह सकता है कि हिन्दू धर्ममें अस्पृश्यताको स्थान नहीं है?
२. "तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्ये व्यवस्थितौ" इस गीता-वाक्यको अविचल श्रद्धा-भक्तिके साथ माननेवाली सनातनधर्मी जनता ही भारतवर्षमें अधिक है, और उसमें आपको काम करना है, अतएव जबतक आप अपने अछूतोद्वारवाले कार्यक्रमको शास्त्र-सम्मत सिद्ध न कर लें तबतक उसका प्रचार कैसे हो सकता है।
३. मुसलमान उलेमाओंके हृदयमें यह भाव कूट-कूटकर भरा है कि इस्लाम धर्मके सिवा दूसरे धर्मको माननेवालोंकी हत्या करना सवाब है, वे काफिर हैं, उनके साथ मेल तभी हो सकता है जब वे इस्लाम धर्म कबूल कर लें। जबतक छोटे-बड़े सभी मुसलमान इन्हीं उलेमाओंके अधीन हैं, तबतक हिन्दू-धर्मकी रक्षा करते हुए हिन्दू लोग मुसलमानोंसे किस प्रकार मेल कर सकते हैं?
मेरे उत्तरमें पण्डित महाशय पाण्डित्यकी आशा न करें। मैंने धर्मको अनुभव द्वारा जिस रूपमें जाना है, शास्त्रको अनुभवसे मैं जिस तरह समझा हूँ, उसीके आधार पर उत्तर देनेका नम्र प्रयत्न करता हूँ।
केवल श्रुति स्मृतियोंके नामपर कोई वचन धर्म-वाक्य नहीं बन सकता। ऐसी कोई भी बात जो सत्यादि अटल सिद्धान्तोंके विरूद्ध है, धर्म-प्रमाण नहीं हो सकती।