१२९. क्या यह अनुपम नहीं है?
यद्यपि शिमला और दार्जिलिंग भी हिमालयके अंचल हैं, मगर वहाँ मुझे हिमालय के महत्वका भान नहीं हो सका था। यों वहाँ मैं थोड़े ही समय तक रहा; किन्तु मुझे तो वह प्रदेश एक अंग्रेजी बस्ती जैसा ही लगा। अलमोड़ेमें जाकर अलबत्ता मैं इस बातकी कल्पना कर सका कि हिमालय क्या है। अगर हिमालय न हो तो गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और सिन्धु न हों; हिमालय न हो, तो न बारिश हो और ये नदियाँ ही न हों; और तब फिर भारत सहरा जैसी मरुभूमि बन जाये। उस बातके जाननेवाले और हमेशा हर बातके लिए ईश्वरका उपकार माननेवाले हमारे दीर्घदर्शी पूर्वजों ने हिमालयको यात्राका धाम बना दिया था। इस क्षेत्रमें हजारों हिन्दुओंने ईश्वरकी शोधमें अपनी देहका बलिदान किया है। वे पागल नहीं थे। उनकी तपश्चर्याका ही बल है कि आज हिन्दू-धर्म और हिन्दुस्तान जीवित है।
कौसानीमें सूर्यके तेजमें नाचते हुए बर्फसे ढके शिखरोंकी कतारका दर्शन करते हुए मैं यह विचार कर रहा था कि हिमालयके इन श्वेत शिखरोंको देखकर भिन्न-भिन्न कोटिके लोग क्या विचार करेंगे। उस समय जो विचार एक-पर-एक आते गये, पाठकों को भी उनका भागीदार बनाकर मनको हलका कर लेता हूँ।
बालक उस दृश्यको देखें तो कह उठे: यह तो 'फेनी' का पहाड़ है, चलो हम दौड़ चलें और उसपर बैठकर 'फेनी' चखें। मुझ जैसा चरखेका दीवाना कहेगा, कपास चुनकर, लोढ़कर और फिर उसकी रुईको पींजकर किसीने रेशमी रुईका जबर्दस्त पहाड़ खड़ा कर दिया है। इस देशके लोग कैसे पागल हैं कि इतनी रुईके होते हुए भी नंगे भूखे और मारे-मारे फिरते हैं? धर्मनिष्ठ पारसी जा पहुँचे तो सूर्यदेवको नमस्कार करता हुआ कहेगा: अभी हाल सन्दूकमेंसे निकाली हुई नई, उज्ज्वल दूध-जैसी पगड़ी और वैसे ही उज्ज्वल और तह किये हुए जामे पहन कर पर्वत-रूपी हमारे दस्तूर-गण सूर्यनारायणके दर्शनमें लीन होकर हाथ जोड़कर, स्थिरचित्त खड़े हैं और शोभा पा रहे हैं? भावुक हिन्दू इन जगमगाते और साथ ही सुदूर घने बादलोंमें से पानी झेलते हुए शिखरोंको देखकर कहेगा: यह तो साक्षात् दयाके भण्डार शिवजी अपनी उज्ज्वल जटामें गंगाजीको झेल रहे हैं और सारे भारतको प्रलयसे बचा रहे हैं।
शंकराचार्य भी अलमोड़ामें घूमे थे। उन्हें आज भी यह कहते सुन रहा हूँ: सचमुच यह अद्भुत दर्शन है, मगर सारी ईश्वरी माया है। न हिमालय है, न मैं न तु है; जो कुछ है सो वह है, और वह भी ब्रह्म ही है। वही सत्य है, जगत मिथ्या है। बोलो 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या।'
पाठको! सच्चा हिमालय हमारे हृदयोंमें है। इस हृदय रूपी गुफामें छिपकर उसमें शिवदर्शन करना ही सच्ची यात्रा है, यही पुरुषार्थं है।
नवजीवन, १४-७-१९२९