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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/२७१

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बिना राँधे आहारके प्रयोग

रखनेका मेरा निश्चय कहीं अधिक बलवान हो गया है। पहली पुस्तकमें आहार पर ठीक तरहसे प्रकाश डालनेवाला एक प्रकरण है और दूसरीमें, जो कि भारतके बच्चोंको समर्पित की गई है, बड़ी सरल और संक्षिप्त भाषामें आवश्यक आहार-सम्बन्धी वे तमाम उपयोगी बातें बता दी गई हैं, जो किसी साधारण पाठकके लिए उपयोगी हो सकती हैं। यह पुस्तक बड़ी सावधानोके साथ पढ़ी जाने योग्य है। मेरे विचारमें ग्रन्थकारने जैविक आहार (जैसे मांस और दूध) पर बहुत ज्यादा जोर दिया है, यद्यपि उनके लिए यह बिलकुल स्वाभाविक है। वनस्पति-जगत् में मनुष्यके सम्पूर्ण पोषणकी अनन्त सम्भावना पड़ी है; वर्तमान औषधि विज्ञानने अभी तक इस क्षेत्रको अछूता ही छोड़ दिया है, और वह सहज स्वभावके वश होकर मांस और मांस नहीं तो दूध और उससे बने अन्य पदार्थों पर ही जोर देता रहा है। भारतीय चिकित्सकों का, जो परम्परासे शाकाहारी हैं, कर्तव्य है कि वे इस कार्यको पूरा करें। विटामिन या जीवनतत्त्वकी तेजीके साथ होनेवाली शोधने और सीधे सूर्यसे महत्वके विटामिन पानेकी सम्भावनाने चिकित्सा-शास्त्र द्वारा प्रस्थापित और स्वीकृत आहार-सम्बन्धी कई सिद्धान्तोंमें क्रान्तिका क्षेत्र प्रस्तुत कर दिया है। चाहे जो हो, दोनों ग्रन्थकार इस बात पर तो मुझे एकमत होते मालूम पड़ते हैं कि तमाम खाद्य पदार्थ उनकी प्रकृत अवस्थामें ही खाये जाने चाहिए, बशर्ते कि हम उनसे ज्यादासे-ज्यादा लाभ उठाना चाहते हों और खासकर अगर हम उनमेंके कुछ महत्वपूर्ण जीवनतत्त्वोंको नष्ट होनेसे बचाना चाहते हों। उनका मत है कि आगसे कुछ जीवनतत्त्व नष्ट हो जाते हैं, और गेहूँको मैदा बनानेमें और चावलको पालिश कर देने पर उनके सारे उपयोगी क्षार और जीवनतत्त्व निकल जाते हैं।

पिछले लेख[] में मैं कह चुका था कि कोई मेरे प्रयोगका जल्दीमें अनुकरण न करे। मगर अब दो महीनेके अपने अनुभवके बाद मैं यह कह सकता हूँ कि यदि लोग थोड़े प्रमाणमें दूध-घी लेते हुए यह प्रयोग करना चाहें, तो निश्चिन्त होकर कर सकते हैं। यद्यपि मैं खुराक आग पर बिना पकाये लेने के साथ-साथ दूध और घी भी नहीं ले रहा हूँ तथापि मैं दूसरोंसे अभी घी और दूध छोड़ने की सिफारिश नहीं करूँगा। यों तो मेरा यह विश्वास अडिग है कि दूध और घी दोनोंको छोड़कर भी स्वास्थ्यको बिना किसी खतरेके कायम रखा जा सकता है। किन्तु मैं अभी इस बातका दावा नहीं कर सकता कि मैंने शाकाहारके ऐसे सन्तुलित मिश्रणकी खोज कर ली है जिससे ठीक वे ही लाभ मिल सकते हों जिनके दूध आदि लेनेसे मिलने की बात कही जाती है। इन लेखकोंका यह कहना तो है ही कि थोड़ा दूध और शुद्ध घी लेते रहनेसे वनस्पतियोंसे प्राप्त प्रोटीन और स्निग्ध पदार्थोंके लाभमें वृद्धि हो जाती है और इससे उनको पचानेमें भी मदद मिलती है।

इस समयकी मेरी खुराकका प्रमाण यों है:

पिसे हुए अंकुरित गेहूँ
पिसा हुआ बादाम

८ तोला
४ तोला

  1. देखिए "दीवाना" १३-६-१९२९ और "वनपक्व बनाम अग्निपक्व, १६-६-१९२९।