१५५. पत्र: फूलसिंह डाभीको
आश्रम, साबरमती
२१ जुलाई, १९२[९][१]
तुम्हारा पत्र मिल गया है। बालक खुराकके प्रयोग करें यह मुझे अच्छा तो लगेगा ही किन्तु ऐसा तुम्हारी देख-रेख या सलाहसे ही किया जा सकता है। यहाँ तो मैं बालकोंको भी प्रयोग करने देता हूँ। इससे उनको नुकसान नहीं होता। तुम्हारी पत्नीके लिए सबसे बड़ी चीज चौबीस घंटे खुली हवा, धूप और पूरा आराम है। उसे दूध और ताजा फल जितना मिल सके, उतना खाना चाहिए। जौके दलियेके बजाय घर पीसे हुए गेहूँके दलियेकी भाखरी खाना ज्यादा अच्छा होगा। उसे खूब चबाना चाहिए। भाखरी कम और दूध अथवा दही ज्यादा खायें। सब्जीके कच्चे पत्ते भी चबाने चाहिए। ऐसा करे तो शरीर जरूर स्वस्थ हो जायेगा।
मोहनदासके वन्देमातरम्
मारफत
श्रीयुत श्री व॰ बे॰ राष्ट्रीय विनय मन्दिर, सुनाव
बरास्ता आनन्द
गुजराती (जी॰ एन॰ १२९३) की फोटो-नकलसे।
१५६. पत्र: जेठालाल जोशीको
आश्रम
साबरमती
२१ जुलाई, १९२९
तुम्हारे पोस्टकार्डका जवाब देना बाकी है। आदर्शोंका पूर्ण पालन करते रहनेके लिए अपने प्रति जितनी सख्तीकी जरूरत है उतनी दूसरोंके प्रति सहिष्णु बननेकी है। कुटुम्बके लोगों को भी विनयसे ही समझायें। अधीरता या जबरदस्ती अपने आदर्श-
- ↑ खुराक सम्बन्धी प्रयोगके उल्लेखसे।