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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/२९६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

वह घातक होगा, और उसके कारण भारतके करोड़ों स्त्री-पुरुष मृत्युके मुखमें चले जायेंगे। अगर मनुष्य कोई ऐसी कोशिश करे कि जिससे हाथका कौर मुँह तक ले जाने में हाथसे काम न लेना पड़े तब तो कोई बात हो नहीं बची; हाथका काम यन्त्रको करने देना और इस तरह अत्यन्त गर्म भोजन खाते समय हाथके स्पर्श-स्नायु मस्तिष्क तक जो सन्देश पहुँचाते रहते हैं उनके द्वारा मिलनेवाली स्वयंसिद्ध रक्षासे वंचित रह कर कभी-कभी मुँहको जला लेनेकी जोखिम उठाना भयंकर है।

तीसरी बातका उत्तर तो इसी में आ जाता है। ‘चरखके लिए दी गई शर्तें मनुष्य-स्वभाव और वर्तमान लोक-रुचि’ के विपरीत तो हैं ही नहीं बल्कि वे तो ‘मनुष्य-स्वभाव और वर्तमान लोक रुचि’ पर ही आश्रित हैं। भारतके लिए तो यह कोई अजीब बात नहीं है। अगर ऐसा होता तो जहाँ देशकी अन्य अनेक राष्ट्रीय प्रवृत्तियाँ निराशा और उलझनोंमें फँसी पड़ी हैं, वहाँ चरखेका सन्देश २,००० गाँवोंमें न फैला होता, और न उसने धीमेही सही लगातार इतनी तरक्की की होती, जितनी कि पिछले ८ वर्षोंको जागृति में हमारी आँखों देखते हुई है।

चौथे मुद्दे में लेखक यन्त्र-युगकी पूजाको इसलिए उचित नहीं मानते हैं कि उससे ‘देशको आन्तरिक आवश्यकताएँ पूरी हो सकती हैं,’ बल्कि इसलिए कि उससे ‘विदेशी बाजारों पर आक्रमण किया जा सकता है, वे हथियाये जा सकते हैं।’ सौभाग्य से हो या दुर्भाग्य से, भारतके पास कोई विदेशी बाजार ही नहीं हैं जिन पर वह आक्रमण करे या जिन्हें हथियाये। और अगर यह लेखक ऐसी कोई योजना तैयार कर रहे हैं, तो मेरे विचारमें चरखेके समर्थकोंने अपने सामने जो कार्यक्रम रख छोड़ा है, उसके मुकाबले उनकी योजनाका सफल होना कठिनतर काम है।

लेखकका आखिरी मुद्दा उनकी सारी दलीलों पर पानी फेर देता है। ये भारत को अर्वाचीन भी बनायेंगे और उसकी आध्यात्मिकता को भी सुरक्षित रखेंगे, जिसके बिना, जैसा कि वह बड़े टाइपमें देते हैं, ‘अर्वाचीनता प्रलयकारिणी सिद्ध होगी।’ वे भारतसे वह काम कराना चाहते हैं, जिसे अनुभवी ऋषियोंने असम्भव बतलाया है। ‘मनुष्य परमात्मा और लक्ष्मी दोनोंको नहीं पूज सकता।’ वह इस बातको लगभग मंजूर करते हैं कि पश्चिम इन दोनोंमें सामंजस्य बैठाने में असफल हुआ है। फिर वह क्योंकर यह सोचते हैं कि भारत उस असम्भव कामको कर सकेगा? हम यह क्यों न सोचें कि अगर हमारे पूर्वज इसे कर सकते तो बहुत पहले उन्होंने यह

कर लिया होता? सचमुच इस प्रयत्नके बाद हो उपनिषदोंके रचयिताओंने कहा था: ‘सब कुछ परमात्माका है। अतएव इस तरह रहो कि तुम्हारा मन तुम्हारे पड़ोसीकी सम्पति के लिए न ललचाये।’[] हथियाने का मतलब ही जबर्दस्ती करना है। जबर्दस्ती का आध्यात्मिकतासे कभी मेल नहीं बैठाया जा सकता। अतएव ऐसे विषादपूर्ण विषम विचारवाले लेखको पढ़कर मुझे दुःख हुआ और सो भी एक ऐसे पत्र में जिसका ध्येय एकमात्र आध्यात्मिक-संस्कृतिका प्रचार है।

  1. ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्।
    तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥