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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/२९८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

दुर्लभ हो गया है। मजदूर वर्ग बेकार बैठा है। जिन किसानोंके पास जरा-जरा-सी जमीन है, उनकी हालत दयनीय हो हो गई है। उनके पास न तो पेट भर खानेको अनाज है, न नई जमीन लेकर जोतने योग्य पूँजी। सौ के करीब गाँवोंमें बाढ़ अब उतर चुकी है; उनकी हानिके आँकड़े मिले हैं; अन्दाजन उन गाँवों में करीब अब नौ लाख रुपयोंकी फसल बरबाद हो चुकी है। बाढ़के पहले भी इन गाँवोंकी हालत बहुत अच्छी तो नहीं ही थी। लेकिन इस नये संकटके कारण तो उनका सर्वनाश ही हो गया है।

संकट-निवारणका काम लम्बे समय तक जारी रखना पड़ेगा। क्योंकि कई खेत ऐसे हैं, जिनमें जुलाई १९२० से पहले कोई भी फसल खड़ी नहीं की जा सकती। चरखे बनवाने, जमीन जुतवाने, धान साफ करने और कताईकी व्यवस्था के लिए बहुत ज्यादा रुपयोंकी जरूरत पड़ेगी। अतएव सभीसे हमारी नम्र प्रार्थना है कि वे इस आपत्तिकालमें टिपराकी जनताकी सहायता करें।

चन्देकी तमाम रकम श्री सुरेशचन्द्र बनर्जी (अध्यक्ष) या डा॰ प्रफुल्ल-चन्द्र घोष (मन्त्री) के नाम अभय आश्रम, कुमिल्ला,’ के पतेसे भेजी जानी चाहिए। हर तरह की सहायता सधन्यवाद स्वीकार की जायेगी।

यह तो मेरे पास जो पत्र आ रहे हैं उनमेंसे केवल एक है[]

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २५-७-१९२९
 

१६२. बड़ौदा राज्यमें मिल मजदूर[]

सेवामें,

सम्पादक ‘यंग इंडिया’

महोदय,
मैं बड़ौदा राज्यमें सूती कपड़ा मिलों और अन्य कारखानोंके मजदूरोंकी दयनीय दशाकी ओर आपका ध्यान दिलाना चाहूँगा और प्रार्थना करूँगा कि इन लोगों की स्थिति सुधारने में आप कृपापूर्वक अपनी सहायता प्रदान करें। शायद आपको यह मालूम है कि ब्रिटिश भारतमें सन् १९२२से श्रमिकोंसे सप्ताह में साठ घंटे काम लेनेकी व्यवस्था है; अर्थात् उन्हें दिनमें दस घंटे काम करना पड़ता है। लेकिन बड़ौदा राज्यकी मिलोंमें, आज भी श्रमिकोंसे १२ घंटे, और आवश्यकता पड़ने पर इससे भी अधिक समय तक काम लेनेकी छूट है। यही स्थिति बाल-श्रमिकों की है। यहाँ कारखाना कानूनके अनुसार आधे समय तक
  1. इस शीर्षकको २८-७-१९२९ के नवजीवन में प्रकाशित टिप्पणीसे भी मिला लिया गया है।
  2. यह ‘चिट्ठी-पत्री’ शीर्षकके अन्तर्गत प्रकाशित हुआ था।