- इस्लामका अमृतपान करायें। ...इस्लाम एक विजयिनी शक्ति है, और मुसलमानोंका जन्म हो इसलिए हुआ है कि वे स्वातन्त्र्य और साम्राज्य हासिल करें। अगर हम अपना संख्या-बल बढ़ानेकी जी-तोड़ मेहनत करें तो ये दोनों बातें हमें प्राप्त हो सकती हैं। हम भारत-माताके बालक हैं और उस मातृ-भूमिके प्रति हमारे कुछ कर्तव्य भी हैं। और - दूसरे देशोंकी भाँति उसका भी राष्ट्रोंकी मण्डलीमें बराबरीका स्थान होना चाहिए। हिन्दू-भारतके किये यह सब हो नहीं सकता। अकेले इस्लामके झण्डेके तले रहकर ही वह स्वतन्त्र हो सकता है।
ग्रन्थकारने अपनी इस मनोवांछित लालसाको पूरा करनेके लिए जहरमें बुझी कलमसे काम लिया है और एक महान् अर्वाचीन सुधारकको, उसके ग्रन्थोंको, और उसके महान एवं बुद्धिशाली आर्यसमाजको पानी पी-पी कर कोसा है और साथमें हिन्दुओं तथा हिन्दू-धर्मको भी घसीटा है। मैं श्री दुर्रानीको सलाह देता हूँ कि वे अपनी पुस्तक पर फिरसे विचार करें। इस अपमानजनक पुस्तकके प्रकाशनके लिए क्षमा-प्रार्थना करें, और पुस्तक वापस ले लें। मैं सलाह देनेका यह साहस इसलिए कर रहा हूँ कि अपने एक सार्वजनिक पत्रमें उन्होंने कहा है:
- अगर कोई यह साबित कर दे कि पुस्तक द्वेष-भावनासे प्रेरित होकर और दिल दुखानेकी गरजसे लिखी गई है, तो में यह प्रतिज्ञा करता हूँ, कि इसी संस्करणको लौटा लूँगा और पुस्तकको बिक्री सर्वथा बन्द कर दूँगा। किसी सरकार के बजाय में अपनी विवेक-बुद्धिसे ही अधिक डरता हूँ। मगर इस मामले में मेरा मन बिलकुल साफ है।
अगर मेरी सम्मतिका कोई मूल्य है, तो मैं यह कह सकता हूँ कि उक्त पुस्तकसे हरएक आर्यसमाजी, हरएक हिन्दू और वस्तुतः हरएक पक्षपातहीन स्त्री और पुरुषका-जिसमें मुसलमान भी शामिल हैं-दिल अवश्य ही दुखेगा। अगर पेड़की कीमत उसके फलसे हो सकती हो तो कहना चाहिए कि प्रस्तुत पुस्तक द्वेष-भावनाका फल है।
यंग इंडिया, २५-७-१९२९