१६४. स्वावलम्बनके आधारपर खादीकी प्रगति
खादी-प्रतिष्ठान सोदपुरके श्री सतीशचन्द्र दासगुप्तको ‘नवजीवन’ के सब पाठक जानते होंगे। कुछ दिन हुए उन्होंने राष्ट्रीय-सेवा-संघ नामक एक संस्थाकी स्थापना की है। संस्थाका उद्देश्य लोगों में खादी-उत्पत्तिकी स्वावलम्बन पद्धतिका प्रचार करना है। वे इस कोशिशमें हैं कि इसी उद्देश्यको लेकर सब लोग अपना-अपना सूत खुद कातने लगें। श्री सतीशबाबूने इस सिलसिले में उक्त संघके कार्योंका एक दिलचस्प विवरण भेजा है। वह नीचे दिया जा रहा है।[१]
संघको काम शुरू किये अभी कुछ ही महीने हुए है। उस दृष्टिसे मैं कहूँगा कि उसने अच्छा काम करके दिखाया है। यदि यह बात लोकप्रिय हो जाये तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि स्वावलम्बनकी पद्धति सबसे सस्ती और कारगत सिद्ध होगी।
- [अंग्रेजीसे]
- यंग इंडिया, २५-७-१९२९
१६५. मेरी अपूर्णता
एक पाठक लिखते हैं:[२]
पाठकने जो कुछ लिखा है, सो उचित ही है। मैं शहद लेता हूँ, क्योंकि मैंने अबतक उसका सर्वथा त्याग नहीं किया है। मेरी अपूर्णताको जितना मैं जानता हूँ, दूसरे शायद ही जान सकते हैं। बात यह है कि ऐसी कई वस्तुएँ हैं जिनका त्याग मुझे इष्ट लगता है, परन्तु मैं उनका त्याग नहीं कर पाया हूँ। मेरे स्वास्थ्यके लिए शहद अच्छा माना गया है। मैं कई खाद्य पदार्थोंका त्याग कर चुका हूँ। इसलिए यह जानते हुए भी कि शहदमें हिंसा है, मैं उसका त्याग करनेका साहस नहीं कर सका हूँ। बुद्धिसे किसी वस्तुको त्याज्य समझना एक बात है, हृदयसे उसे छोड़ना दूसरी। इतना लिख चुकने पर मैं कह सकता हूँ कि शहद छोड़नेका मेरा प्रयत्न चालू है। परन्तु शहद छोड़ने पर चीनी, गुड़, इत्यादिका छोड़ना भी आवश्यक हो जाता है। विकृतिकी दृष्टिसे चीनी सबसे बुरी चीज है। चीनी बनाने में हिंसा भी काफी होती है। शहदसे मुझको कोई हानि नहीं हुई है। डाक्टरोंका अभिप्राय है कि आरोग्यके लिए मधु अच्छी वस्तु है। एक बात और। मधु प्राप्त करनेकी आधु-