कि अभी सदस्योंसे बाहर आनेकी बात कहने का समय नहीं आया है। यद्यपि मेरा तो यही ख्याल है कि वह समय आ गया है और विधानमण्डलोंसे सम्बन्ध विच्छेद करके देशको बहुत लाभ होगा। कांग्रेसके अध्यक्षको जो राय आज है वह मेरी राय पहले भी थी और आज भी है। किन्तु हमें यह भी देखना है कि व्यक्तिगत रायों पर अमल करवानेसे कांग्रेस-संगठनका संचालन सहूलियतके साथ नहीं हो सकता। महात्मा गांधीने कहा:
आप लोग जानते हैं कि जब स्वराज्य पार्टी बनी और मैं जेलसे छूटकर आया तो मैंने आपके अध्यक्ष और श्री चित्तरंजनदासके साथ समझौता किया। मैं उनके सामने झुका और वही बात आज भी कर रहा हूँ। मैं आज अपना सिर कांग्रेस अध्यक्ष के सामने तो नहीं झुका रहा हूँ, किन्तु उन लोगोंके सामने झुका रहा हूँ जो समझते हैं कि फिलहाल उन्हें अपनी जगहें खाली करने पर बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। हम सब मिलकर काम करना चाहते हैं।
एकता बनाये रखनेकी इस चिन्तासे प्रेरित होकर ही मैंने कल कार्य-समितिको सलाह दी कि यद्यपि कमेटीके सुझावके अनुसार कदम उठाने का समय आ गया है, तथापि हमें विधानमण्डलोंके कांग्रेस सदस्योंको आजकी इच्छा के मुताबिक चलना चाहिए।
महात्मा गांधीने आगे चलकर कहा कि यद्यपि इस्तीफे देनेकी बात आज निलम्बित कर दी गई है, तथापि यह प्रस्ताव सदस्योंको इस बातका अधिकार देता है कि यदि कोई ऐसी नई समस्या खड़ी हो जाये जिसके कारण उन्हें लाहौर कांग्रेसके पहले विधानमण्डलों से हटना आवश्यक लगे तो वे बिना कार्य-समिति से पूछे स्वेच्छापूर्वक त्यागपत्र दे सकते हैं।
प्रस्ताव इस बात पर भी जोर देता है कि पहली जनवरी १९३० से तैयारी प्रारम्भ कर देना हमारा धर्म है। पहली जनवरीसे जो-कुछ कहना जरूरी है उसे करनेकी तैयारी तो आजसे ही शुरू कर देनी चाहिए। अगली ३१ अगस्तको लोगों से इस बातका हिसाब पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने कांग्रेसके सदस्य बनानेके लिए क्या-क्या प्रयत्न किये हैं। कांग्रेसके वे सदस्य जो परिषदोंमें हैं, केवल परिषदोंमें काम करें और उसके बाहर नहीं, ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती। इस प्रस्तावसे उनका उत्तर-दायित्व बढ़ गया है।
मैं उनसे यह भी कहना चाहूँगा कि जब कमेटीने उनकी रायको इतनी अहमियत दी है तो उन्हें भी यह चाहिए कि वे अपना कर्त्तव्य बड़ी लगनके साथ करें।
अन्तमें महात्मा गांधीने आशा व्यक्त करते हुए कहा कि समझौते के इस प्रस्ताव-को स्वीकार करने के आधार पर ऐसा नहीं समझा जा सकता कि वे लोग (विधान-मण्डलों के कांग्रेसी सदस्य) स्वतन्त्रता नहीं चाहते अथवा अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन नहीं चाहते। मुझे पूरा विश्वास है कि एक जनवरी १९३० को वे अपने-आपको सर्वथा योग्य सिद्ध करेंगे।
- [अंग्रेजीसे]
- लीडर, २९-७-१९२९