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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/३१०

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

आर्यसमाज और हिन्दू-महासभा अपनी अन्त्यज-सेवाके लिए धन्यवादकी पात्र हैं। मैं जहाँ थोड़ा-बहुत भी कर सकता हूँ, करता हूँ। लेकिन मैं कबूल करता हूँ कि कई बार काम करनेके तरीकेमें भेद होने की वजहसे मैं अपनी सेवाएँ समर्पित नहीं कर सकता। मुझे इस बातका लोभ नहीं है कि हरएक कार्यमें मेरा हाथ होना ही चाहिए, न हरएक कामके करनेकी मुझमें शक्ति ही है। मुझे अपनी शक्तिका भान है, उस मर्यादामें रहकर मुझसे जो कुछ हो सकता है, करके कृतार्थ होता हूँ।

[गुजरातीसे]
नवजीवन, २८-७-१९२९

१६९. सन्देश : कांग्रेस मुस्लिम दल, बम्बईको

२८ जुलाई, १९२९[]

आप लोगोंने कांग्रेस मुस्लिम दलकी स्थापना की है, इससे मुझे प्रसन्नता हुई है। अगर दलको पूरा-पूरा समर्थन मिला और अगर वह सो नहीं गया तो उससे कांग्रेसको बड़ी शक्ति मिलेगी और दलके द्वारा साधारणतः भारतकी और विशेषतः मुसलमानोंकी सच्ची सेवा हो सकेगी।

[अंग्रेजीसे]
बॉम्बे क्रॉनिकल, २९-७-१९२९

१७०. पत्र: जवाहरलाल नेहरूको

रेलगाड़ी
२९ जुलाई, १९२९

प्रिय जवाहरलाल,

इन्दुके नाम तुम्हारे पत्र[] उत्तम हैं; उन्हें प्रकाशित किया जाना चाहिए। तुमने उन्हें हिन्दी में लिखा होता तो कितना अच्छा होता। कुछ भी हो, उनका हिन्दीमें साथ ही साथ प्रकाशन होना चाहिए।

तुम्हारा विषय-निरूपण बिल्कुल परम्परागत है। आदमीकी उत्पत्ति अब एक विवादास्पद विषय हो गया है। धर्मकी उत्पत्ति तो और भी विवादास्पद बात है। परन्तु इन मतभेदोंसे तुम्हारे पत्रोंका मूल्य नहीं घटता। उनका महत्व तुम्हारे निष्कर्षोंके ठीक होनेमें न होकर निरूपणके ढंगमें और इस तथ्यमें है कि तुमने इन्दुके हृदय तक पहुँचने और अपनी बाह्य प्रवृत्तियोंके बीच में भी उसकी बुद्धिकी आँखें खोलनेकी कोशिश की है।

  1. सन्देश ब्रेलीकी अध्यक्षतामें दलकी पहली बैठकके अवसरपर आबिद अली द्वारा इसी तिथिको पढ़कर सुनाया गया था।
  2. पिताके पत्र पुत्रीके नाम।