१७५. पत्र: शान्तिकुमार मोरारजीको
३१ जुलाई, १९२९
तुमने वापसी डाकसे ही पुस्तक[१] भेज दी है। आशीर्वादके सिवा और क्या भेजूँ?
बापू
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७१४) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य: शान्तिकुमार मोरारजी
१७६. पत्र: हरिभाऊ उपाध्यायको
३१ जुलाई, १९२९
तुम्हारा पत्र मिल गया है। ...[२]के बारेमें ‘नवजीवन’ में लिखा है सो पढ़ लो। तुम्हारी सलाह ठीक है। तथ्य मालूम कर सको तो करना। ...अपवित्र हो तो उसके लिए हमारे पास उपाय ही नहीं है। जो पवित्र हो तो उसकी रक्षा करें।
कताईके बारे में–मेरी दृष्टि दोनों पर है। किन्तु हमें सदस्य तो शिक्षित वर्गसे चाहिये, गरीब कातनेवाली स्त्रियों से नहीं। वे इस बातको न समझ सकेंगी। उत्पत्ति बढ़ानी है और उसमें लोगोंकी दिलचस्पी पैदा करनी है। लोग दिलचस्पी लेने लगें तो उत्पत्ति बढ़ जायेगी। समझदार व्यक्ति दिल और दिमाग लगाकर कातें तो वे बारीक सूतका उत्पादन बढ़ा सकते हैं और नई खोज भी कर सकते हैं। सब नहीं करेंगे। पर ऐसे कातनेवालों में कुछ नई खोज करनेवाले जरूर निकल आयेंगे।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ६०६६ ) से।
सौजन्य: हरिभाऊ उपाध्याय