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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/३१५

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क्या हम स्वराज्यके योग्य हैं?

निर्विवाद है कि देशमें अस्पृश्यताकी कुप्रथाका जोर घट रहा है, तथापि जो दलित जातियाँ दिन-दिन अधिक जागृत हो रही हैं और तथाकथित उच्च जातियों द्वारा अपने पर किये जानेवाले अत्याचारोंके प्रति स्वभावतः जिनके मनमें विरोधका भाव जाग रहा है वे अब पहले से भी अधिक व्याकुल हो चली हैं। उनका यह डर ऊपर-ऊपरसे देखें तो ठीक हो मालूम होता है कि स्वराज्य प्राप्तिके बाद भी अगर यही हाल रहा तो सुधारकोंकी पुकार अरण्यरोदन बनी रहेगी और अबतक जो प्रगति हुई है वह भी अन्धकट्टरताके कारण धूलमें मिल जायेगी। मगर मैं चाहता हूँ कि दलित मित्र यह समझ लें कि उनका यह डर निराधार है। ऐसा डर रखकर वे सुधारकोंके साथ ठीक-ठीक न्याय नहीं करते हैं। स्वतन्त्रता प्राप्तिके बाद संख्याकी बात महत्वपूर्ण नहीं रहेगी। तब मुट्ठीभर लोगोंका दृढ़ संकल्प हमारी समस्याको हल कर सकेगा। जो आगे कदम बढ़ा रहे हैं, वे देख सकते हैं कि स्वातन्त्र्य-संग्रामके अग्र-भागमें सुधारवादी हो डटे हैं, प्रतिक्रियाशील लोग नहीं। क्योंकि प्रतिक्रियाशील लोग तो धर्मके झूठे नाम पर विदेशी शासनकी सहायता लेकर उसके हाथों अपनी रक्षा चाहते हैं। अतएव जब स्वराज्य प्राप्त हो जायेगा, देशके शासनको बागडोर सुधारकोंके ही हाथों जायेगी।

दूसरे, ‘दलित’ जातियोंको यह विश्वास रखना चाहिए कि स्वतन्त्र भारतके लिए जिस संविधानकी कल्पना की जा सकती है, उसमें कानून द्वारा उनके हकोंकी पूरी-पूरी रक्षाका समावेश भी अवश्य होगा।

तीसरे, उन्हें चाहिए कि वे अपने आपको असहाय न समझें और न सुधारकोंकी सहायताकी अपेक्षा ही रखें। उनका पक्ष न्याय्य है और उन्हींको उसकी रक्षा भी करनी है। स्वराज्यका सच्चा अर्थ तो यह है कि स्वराज्य-प्राप्त देशका प्रत्येक सदस्य सारी दुनियाके मुकाबले अपने स्वातन्त्र्यकी रक्षा करनेमें समर्थ हो। आन्तरिक उन्नतिका ही दूसरा नाम स्वराज्य है। दलित भाइयोंकी यह व्याकुलता ही उनकी और भारतकी स्वाधीनताका पूर्ण और अत्यन्त आशाप्रद चिन्ह है। निर्दोष असन्तोष उन्नतिका सूचक है। मगर तबतक के लिए तो उन तमाम मुहर्रिरोंका और दूसरोंका, जो दलित भाइयोंके सम्पर्क में आते हैं, यह परम कर्त्तव्य है कि वे उनके साथ अत्यन्त आदर और शिष्टताका बरताव करें।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, १-८-१९२९