सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/३२७

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
२८९
रानीपरजकी शाला

आज हमें जो काम करना है, वह मुर्दार आदमियोंके किये हो नहीं सकता। स्वराज्यका काम कठिन है। भारतमें आज एक लहर बह रही है; उसमें खिंचकर हम भाषण करते हैं; उपद्रव मचाते हैं, तूफान खड़े करते हैं, चाहे जिस ढंगसे संस्थाओं में घुस जाते हैं और फिर उन्हें नष्ट करते हैं और धारासभाओं में जाकर भाषण करते हैं। तिलक महाराजके जीवनयें ये बातें हमारे देखने में भी नहीं आतीं। उनके जीवनके जो गुण अनुकरणीय हैं, सो तो मैं ऊपर कह ही चुका हूँ। मगर आप इतना करेंगे तो आपका इस राष्ट्रीय विद्यापीठमें रहकर अध्ययन करना सार्थक होगा, अन्यथा आपपर जो खर्च हो रहा है, वह व्यर्थ जायेगा। अगर हम कर्त्तव्य-कर्म न करें तो इन भाषणों और पाठ्य-क्रमके निबन्ध-वाचन आदिके होते हुए हम जहाँ थे वहीं बने रहेंगे और आजके उत्सवमें जो दो घंटे बीते हैं, वे भी निरर्थक सिद्ध होंगे। मुझे आशा है, ऐसा न होगा।

[गुजरातीसे]
नवजीवन, ११-८-१९२९

१८८. रानीपरजकी शाला

ऊपरका मनोरंजक वर्णन[] मुझे जैसा प्राप्त हुआ है वैसा अक्षरशः छाप रहा हूँ। इसमें कई स्पष्ट भूलें हैं; उन्हें मैंने जानबूझकर नहीं सुधारा है। इस शालामें उद्योगोंको प्रमुख स्थान प्राप्त है। बालक अक्षर-ज्ञान खेल-खेल में ही प्राप्त कर लेते हैं। इसमें भाई जुगतरामकी[] कला-कुशलताकी छाप स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी-सी कला हममें न हो तो भी हम उनकी तरह प्रेमपूर्वक काम करना सीख लें; यदि इतना हो जाये तो ऐसी शालाएँ पूरे देशमें खोली जा सकती हैं; तब इस कृषि-प्रधान देशके बालकोंका उद्धार हो जाये और उन्हें आवश्यक शिक्षा प्राप्त होने लगे। इस शाला में रानीपरज बालक संस्कारवान् बनते हैं, आचारवान् बनते हैं, वे आरोग्य-सम्बन्धी नियम सीखते हैं और उनका पालन करते हैं। ये बालक स्वाश्रयी बनते हैं और स्वतन्त्रताका मन्त्र साधते हैं। कोई ऐसी मिथ्या धारणा न बना ले कि इस शाला में रानीपरज बालक ही कुछ सीख सकते हैं और करोड़पतियोंके बालकोंको इसमें कुछ नहीं मिलेगा। यह बात तो सिद्ध की जा सकती है कि करोड़पतियोंके बालकोंके लिए आज जो पाठशालाएँ चल रही हैं उनमें रानीपरज बालकोंका तो दम घुट जाये। इस तरह जहाँ रानीपरज बालकोंका दम घुटता है वहाँ देशका दम ही घुटता है, ऐसा मानना चाहिए। किन्तु वेडछीकी इस शालामें यदि करोड़पतियोंके बालकोंको शिक्षा प्राप्त करनेका सौभाग्य प्राप्त हो तो वे राष्ट्रीयताकी शुद्ध प्राणवायुका पान करेंगे।

[गुजरातीसे]
नवजीवन, ४-८-१९२९
  1. यहाँ नहीं दिया जा रहा है।
  2. जुगतराम दवे, शालाका एक अध्यापक।
४१-१९