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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/३२९

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जो स्वराज्यके लिए पागल हैं, उन्हें अगर खादीकी धुन भी लग जाये तो घर बैठे विदेशी कपड़ेका बहिष्कार किया जा सके और अगर बहिष्कार सफल हो जाये तो जनतामें नये तेजका आविर्भाव हो, नया आत्मविश्वास आये। सभी बालक इन बालकों का अनुकरण कर सकते हैं। क्या माता पिता अपने बच्चोंको ऐसी प्रेरणा देंगे?

शर्मके कारण नाम न बतानेवाले भाईसे

जबतक आप शर्म के मारे नाम छुपाते हैं तबतक दोषमुक्त नहीं हो सकते। यह कुटेव एक बीमारी है ऐसा मानकर उसे किसीसे छुपाना आवश्यक नहीं है। बल्कि यदि प्रकट कर दें तो गलती करनेमें शर्म आने लगे और दोषमुक्त होने में सहायता पहुँचे। जबतक आप झूठी शर्म मानेंगे तबतक मैं आपका उपनिषद् पढ़ना भी निरर्थक मानता हूँ। शर्मके योग्य बात तो गलती करना ही है। गलती छुपानेसे वह दोगुनी हो जाती है।

भूल सुधार

भाई जीवराम कल्याणजी उत्कलमें जो सेवा कर रहे हैं उससे सम्बन्धित मेरे लेख[] के विषय में वे कहते हैं:[]

भाई जीवरामकी इच्छा नहीं है फिर भी मुझे अपने प्रेमके विषय में लिख देना आवश्यक लगा। भाई जीवरामने जो लिखा है उससे उनकी निर्भयता प्रकट होती है। मैंने मूलसे उन्हें जिस प्रशंसाका पात्र कहा उसे वे अंगीकार नहीं करना चाहते। यशके साथ-साथ मजदूरोंका लाभ उठाकर पैसा पैदा करनेकी बात भी कही गई थी――वे उस आक्षेपका मेरी जानकारीके लिए ही खण्डन करना चाहते थे। दोनों ही उद्देश्य निर्मल हैं। हरड़ बीनकर लानेवाले लोगोंको मजदूर कहना चाहिए अथवा नहीं, या उनसे प्राप्त वस्तुके व्यापारको मजदूरोंके बलपर पैसा पैदा करना कहा जाना चाहिए या नहीं, यह बात हमारे विषयकी हदतक प्रस्तुत नहीं है। मेरा यह रुपाल कि जोवरामभाई मजदूरोंसे श्रम कराकर, उन्हें कम मजदूरी देकर पैसा कमानेके विचारसे उत्कल गये हैं, गलत था――पाठकोंको इसपर से इतना ही समझ लेना है। भाई जीवराम जिस भावनासे गये वह भी शुद्ध थी, पाठकोंका तथा मेरा यह जान लेना काफी है। [उनके साथी] भाई मगनलाल गृहस्थ नहीं, ब्रह्मचारी हैं, यह एक विशेष बात है।

[गुजराती से]
नवजीवन, ४-८-१९२९
 
  1. देखिए “उत्कलके कंकालों में”, ७-७-१९२९।
  2. पत्र-लेखकका कहना था कि स्वयं-सेवक मजदूरोंसे फायदा नहीं उठाते। वे तो उनके द्वारा इकट्ठी की हुई हरड़ों की बिक्री कराकर उन्हें मदद ही पहुँचाते हैं। इस क्षेत्रमें और भी सेवक हैं; अतः सेवाका सारा यश किसी एकको नहीं जाता।