१०. कई लोगोंने अनुभव किया है कि यह प्रयोग पशु-प्रवृत्तियोंको शान्त करनेमें निश्चित तौरपर सहायक होता है।
११. पूरी तरह चबाकर खानेकी सुस्पष्ट आवश्यकतापर जितना जोर दिया जाये, थोड़ा है। मैंने देखा कि उद्योग-मन्दिरके बड़े ही सावधान किस्मके निवासियों में से भी कई ऐसे हैं जो चबा-चबाकर खानेकी कलासे अनभिज्ञ हैं और इसीलिए उनके दांत खराब हैं और मसूड़े फूले रहते हैं। इस सिलसिलेमें कुछ ही दिनोंतक काफी देरतक खूब चबा-चबाकर नारियल और हरी सब्जियाँ खानेके बड़े आश्चर्यजनक परिणाम हुए हैं।
अनेक चिकित्सक मेरे प्रयोगमें रुचि ले रहे हैं। जिन वस्तुओंका उपयोग मैं कर रहा हूँ, वे उनके पक्ष-विपक्षमें आयुर्वेदिक ग्रन्थोंके उद्धरण मुझे भेजते रहते हैं। दो या तीनने तो गर्म पानी के साथ शहद लेनेके विरोधमें एक ही तरहकी उक्तियाँ भेजी हैं और उसके गम्भीर परिणामोंकी घोषणाएँ भी की हैं। लेकिन जब मैंने उनसे यह पूछा कि क्या उक्त प्रमाणोंको उन्होंने अपने निजी अनुभवोंके आधारपर भी परखा है, तो वे चुप रह गये। गर्म पानी के साथ शहद लेनेका मेरा अनुभव चार सालसे अधिक पुराना है। इस प्रयोगका मैंने कोई बुरा असर नहीं देखा। शहदके प्रयोगपर अहिंसा के आधारपर भी आपत्ति की गई। इस आपत्ति में काफी वजन है, यह मैं स्वीकार करता हूँ, किन्तु शहद संचय करनेका पश्चिमी तरीका अधिक स्वच्छ है और उसपर ऐसी आपत्ति भी अधिक लागू नहीं होती। मुझे भय है, यदि मैं सभी मामलों में शुद्ध तर्कको ही एक कसौटी मानकर चलूँ, तो मुझे ऐसी बहुत-सी चीजें छोड़ देनी पड़ेंगो जिन्हें मैं खाता हूँ या जिनका उपयोग करता हूँ। लेकिन जीवन केवल तर्कोंसे हो तो अनुशासित नहीं होता। जीवन तो एक जीती-जागती चीज है, ऐसी जीती-जागती चोज जो देखने में बेतरतीब और अनियमित-सी लगती है, पर जिसके अपने नियम और तर्क होते हैं। मैंने, चिकित्सकों की सलाहपर यरवदा जेलमें शहद लेना आरम्भ किया था। मैं निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि उसका प्रयोग अब भी मेरे लिए आवश्यक है या नहीं। पश्चिमके चिकित्सक इसके बड़े प्रशंसक हैं। चीनीकी अत्यधिक बुराई करनेवाले अधिकांश चिकित्सक, शहदकी बहुत तारीफ करते हैं। उनका कहना है कि शहद का प्रयोग उतना उत्तेजक नहीं होता, जितना साफ की हुई चीनी अथवा गुड़का होता है। अभी शहदका प्रयोग छोड़कर मैं अपने प्रयोगोंको कमजोर नहीं बनाना चाहता। यदि बिना राधे भोजनके प्रयोगोंको शंकातीत सफलता मिली तो अहिंसाके पक्षकी अ-सेवाकी अपेक्षा उससे उसकी सेवा ही अधिक होगी।
एक अन्य चिकित्सकने भी अंकुरित दालके प्रयोगके विरुद्ध प्रमाण दिया है; किन्तु इस प्रमाणको पुष्टिमें उसका निजी अनुभव कुछ भी नहीं है। अनेक आयुर्वेदिक चिकित्सकोंसे मेरी यही शिकायत रही है। मुझे विश्वास है कि निश्चय ही चिकित्सा-शास्त्रके संस्कृत ग्रन्थोंमें अपार ज्ञान भरा पड़ा है। पर लगता है कि हमारे यहाँके आयुर्वेदिक चिकित्सा-शास्त्री इतने आलसी हैं कि वे उस ज्ञानका सच्चे अर्थोंमें उलथा करनेका कष्ट नहीं उठाना चाहते। वे छपे-छपाये सूत्रोंको दुहरा कर ही सन्तोष कर