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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/३४४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

प्रकारसे सजा दूँ―जैसा मैंने अक्सर किया है और जिसके परिणाम भी बहुत अच्छे रहे हैं, तो वह उस अर्थ में बल-प्रयोग नहीं कहलायेगा जिस अर्थ में श्री पैनिंगटन उसे लेते हैं। बलका प्रयोग तो वह होगा, पर उस दशामें बल शारीरिक नहीं बल्कि आत्मिक बल होगा, क्रूरताका नहीं बल्कि प्रेमका होगा। मैं स्वीकार करता हूँ कि श्री राजगोपालाचारीकी मद्यनिषेध योजना आत्मिक नहीं बल्कि शारीरिक है, प्रेमपूर्ण नहीं बल्कि क्रूरतापूर्ण है और मैं स्वीकार करता हूँ कि तिसपर भी उसका समर्थन करनेका दोष मैंने किया है; यह दुर्भाग्य की बात है किन्तु है सही कि मेरी अहिंसा अत्यन्त अपूर्ण, असंगतिपूर्ण और सर्वथा अविकसित है। लेकिन फिर भी वह श्री पेनिंगटन अहिंसाकी जितनी कल्पना कर सकते हैं उससे मीलों आगे है। मैं यह मानता हूँ कि भारत में भूखे-नंगे स्त्री-पुरुषों द्वारा की जानेवाली छोटी-मोटी चोरियोंके अपराधके मुकाबले में जिसके लिए उनपर मुकदमे चलाये जाते हैं और सजाएँ दी जाती हैं―नशीले पेयोंका सेवन कहीं बड़ा अपराध है। मैं बिलकुल ही अनिच्छासे लाचार होकर दण्ड-संहिताकी एक मध्यम-सी पद्धतिको स्वीकार करता हूँ; और वह इसलिए कि लोग अभी प्रेमके कानूनको पूरी तरह समझ ही नहीं पाये हैं। और जबतक मैं इसे स्वीकार करता हूँ, मुझे इस बातकी वकालत करनी ही होगी कि उत्तेजक शराब बनानेवालों और बार-बार चेतावनी देनेके उपरान्त भी शराब पीनेवालोंको भी अत्यन्त संक्षिप्त अदालती कारवाईके बाद सजाएँ दी जानी चाहिए। मैं आगमें या गहरे पानी में कूदने पर उतारू अपने बच्चोंको बलपूर्वक रोकने में भी संकोच नहीं करूँगा। इस लाल पानीकी तरफ दौड़ना धधकती भट्ठी या उफनती नदीकी तरफ दौड़नेसे कहीं ज्यादा खतरनाक है। आग और पानी शरीरको नष्ट करते हैं, जब कि शराब शरीर और आत्मा दोनों हीं को।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, ८-८-१९२९
 

२०६. सनातन धर्मके नामपर अधर्म

चूँकि आजकल मैं ‘हिन्दी नवजीवन’ में भी कुछ-न कुछ लिखता हूँ, हिन्दी समाचार-पत्रोंकी जो बातें मेरे देखने योग्य मानी जाती हैं, मेरे सामने रखी जाती हैं। आज मेरे सामने एक अखबार आर्यसमाजका और दूसरा सनातनधर्मियोंका रखा गया है। सनातन धर्मके अखबार में महर्षि दयानन्द स्वामीकी घोर, असभ्य और अश्लील निन्दा की गई है। पत्र में जिस भाषाका प्रयोग किया गया है और जैसे आक्षेप स्वामीजी पर किये गये हैं, वे एक धार्मिक और अपने उत्तरदायित्वको समझनेवाले पत्रको शोभा नहीं देते। सनातन धर्मकी रक्षा करनेवाले इस पत्रकी कुछ प्रतिष्ठा है या नहीं, मुझे पता नहीं। मुझे आशा है, ऐसे पत्रको कोई प्रतिष्ठा नहीं देता होगा।

मुझे डर है कि स्वामीजी पर किया गया यह हमला किसी नीच स्वार्थसे प्रेरित होकर किया गया है और इसी कारण वह इतना असभ्यतापूर्ण और असत्यमय है।