सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/३४६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
३०८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

सकती, ठीक उसी तरह हम अपनी वर्तमान नई दृष्टिके प्रतिपादनकी आशा भी उस ग्रन्थसे न करें। परन्तु यह तो विषयान्तर हुआ। गोस्वामी महाराजने स्त्रीके बारेमें कुछ भी क्यों न माना हो, इसमें सन्देह नहीं कि जो मनुष्य स्त्रीको पशुतुल्य समझता है, उसे अपनी मिल्कियत मानता है, वह अपने अर्द्धांगका विच्छेद करता।

पतिका धर्म है कि पत्नीको अपनी सच्ची सहधर्मिणी, सहचारिणी और अर्द्धांगिनी माने; उसके दुःख से दुखी हो, और सुखसे सुखी। पत्नी पतिकी दासी कदापि नहीं है, न वह कभी पतिके भोगकी भाजन ही है। जो स्वतन्त्रता पति अपने लिए चाहता है, ठीक वही स्वतन्त्रता पत्नीको भी होनी चाहिए।

जिस सभ्यता में स्त्री-जातिका सम्मान नहीं किया जाता, उस सभ्यताका नाश निश्चित ही है। संसार न अकेले पुरुषसे चल सकता है, न अकेली स्त्रीसे; इसके लिए तो एक-दूसरेका सहयोग ही उपाय है। स्त्री अगर कोप करे तो आज पुरुष-वर्गका नाश कर सकती है। यही कारण है कि वह महाशक्ति मानी गई है।

हिन्दू सभ्यता में तो स्त्रीका इतना सम्मान किया गया है कि प्राचीन कालमें स्त्रीका नाम प्रथम पद रखता था। उदाहरणार्थ, हम ‘सीताराम’ कहते है, ‘रामसीता’ कदापि नहीं। विष्णुका ‘लक्ष्मीपति’ नाम प्रसिद्ध है ही। महादेवको हम पार्वती-पतिके नामसे भी पूजते हैं। महाभारतकारने द्रौपदीको और आदि-कवि बाल्मीकिने सीताजीको गौरवका स्थान दिया ही है। हम प्रातःकाल सतियोंका नाम लेकर पवित्र होते हैं। जो सभ्यता इतनी उच्च है, उसमें स्त्रियोंका दर्जा पशु या मिल्कियतके समान कदापि हो नहीं सकता।

अब जो प्रश्न पूछे गये हैं उनका उत्तर देना सहज है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि पतिके कमाये हुए धनपर स्त्रीको पूरा अधिकार है और पत्नी पतिकी मिल्कियतकी अविभाज्य भागीदार है। पत्नीकी रक्षा करना और अपनी हैसियतके मुताबिक उसके भरण-पोषण और वस्त्रादिका प्रबन्ध करना पतिका आवश्यक धर्म है।

हिन्दी नवजीवन, ८-८-१९२९

२०८. पत्र: नाजुकलाल नन्दलाल चौकसीको

आश्रम, साबरमती
८ अगस्त, १९२९

भाई नाजुकलाल,

तुम्हारा पत्र मिला, इस वक्त तुम्हारे लायक मेरे पास कुछ है नहीं।मोतीभाईकी माँग स्वीकार कर लो। जब भी मेरे पास तुम्हारे लायक कुछ होगा तब मैं फौरन पर्याप्त नोटिस देकर बुला लूँगा।

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (एस॰ एन॰ १२१४६) की फोटो-नकलसे।