मुझे यह स्पष्टीकरण इसलिए करना पड़ता है कि आज भी मुझे कुछ ऐसे उदाहरण याद हैं जिनमें अनीतिपूर्ण कार्योंको व्रतका रूप दिया गया था। जब असहयोग आन्दोलन अपने पूरे जोश में था, किसीने पूछा था: “मैं सरकारकी नौकरी करनेको बँधा हूँ, अब उसे कैसे छोडूँ?” “मैं शराबकी दुकान पर पाँच वर्ष तक काम करनेकी शर्त मान चुका हूँ, अब उसे कैसे छोडूँ?” कई बार ये और ऐसे प्रश्न आदमीको उलझन में डाल देते हैं। लेकिन हम गहरा विचार करके देखें तो हमें पता चलेगा कि पाप करनेके व्रत नहीं लिये जाते; व्रतमें उन्नति ग्रहीत है, अवनति कदापि नहीं।
लेखकने अन्त में कहा है “लेकिन जब आजकलके देश-नेताओंके मन दृढ़ नहीं रह सकते तो मुझ-जैसोंकी क्या कथा?” यह सवाल कमजोरीका सूचक है। देश-नेताओंके गुणों का संग्रह करना चाहिए। देश-नेता कोई सम्पूर्ण अवतार नहीं होते। वे अपने कतिपय गुणोंके कारण नेता बनते हैं। हम उनपर विचार करें, उनका अनुसरण करें। उनके दोषोंका स्मरण तक न करें। जो पुत्र अपने पिताके दोषोंका संग्रह करके उनपर अमल करता है, अथवा उनसे दूर रहने में अपने आपको असमर्थ पाता है, वह सुपुत्र नहीं है। विरासत पिताके गुणकी हो सकती है, दोषकी नहीं। जो पुत्र पिताके ऋणको बढ़ाता है, वह नालायक है। सुपुत्र ऋण चुकाता और पूंजी बढ़ाता है।
- [गुजरातीसे]
- नवजीवन, ११-८-१९२९
२१४. जहरकी तरह कड़वी
एक भाईने बहुतेरे सवाल पूछे हैं, उन सबके जवाब देनेकी मैं कोई आवश्यकता नहीं समझता। उन सवालों में से एक यों हैं:
- जनवरी १९३० की पहली तारीख तेजी से चली आ रही है। किन्तु आप तो, ‘खादी, खादी और खादी’ ही कहते चले जा रहे हैं। सिर्फ खादी आन्दोलनमें मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है, देशको भी वह जहर-सा कड़वा लगने लगा है। अच्छा तो यह हो कि आप सुभाषचन्द्र बोस और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओंको आज्ञा देकर भारतमेंसे ऐसे एक करोड़ नौजवानोंका दल खड़ा करवाइए, जो देशके लिए अपने सिर दे सकें; और फिर आप इन नौजवानोंसे खादी या (देशी) मिलोंके कपड़े पहनने की प्रतिज्ञा करवाइए। और फिर जिन नियमों का पालन अत्यन्त आवश्यक हो, उन्हें भी स्पष्ट कर दीजिए। आप चाहें तो इन नियमोंमें खादीको अग्रस्थान दे सकते हैं। याद रहे कि सिंह-सा भूखा भारत देश आज भी १९२१ की भाँति फिर सविनय-भंगके लिए तैयार है, मगर कोई कर्णधार नहीं मिल रहा। दूसरी ओर वल्लभभाई-जैसे नेताओंको मजदूरों और किसानोंका संगठन करनेकी सलाह दीजिए। उनके इस प्रयत्नसे