- जिस तरह बारडोलोके हजारों किसान तोपके गोलोंके सामने खुली छाती अडिग खड़े रहने को तैयार थे, उसी तरह दूसरे मजदूर और किसान भी शीघ्र ही एक हो जायेंगे।
भले ही खादी किसीको जहर-सी कड़वी लगने लगी हो, मेरे पास उसे छोड़कर दूसरा कोई इलाज नहीं है। मैं खादीको छोड़कर स्वराज्यकी कल्पना नहीं कर सकता। क्योंकि खादी-विहीन किसान बिना बैलके हल या बिना खादके खेत-जैसा है। खेती किसानका घड़ है और चरखा हाथ-पैर।
और यह कहना कि जन-साधारणको खादी जहर-सी कड़वी लगती हैं, मिथ्या है; हाँ, यह सच है कि अनेक नगरनिवासियोंको वह कड़वी लगती है। मगर शहरोंमें ही तो सारा भारत नहीं आ जाता। भारतके मुट्ठी-भर शहर समुद्र में एक बूँदके जैसे हैं। भारतका आधार उसके देहात हैं। गाँवों में जो सार्वजनिक काम हो रहा है, वह खादी-कार्य ही है। आज देशके २,००० गाँवोंमें खादी-काम हो रहा है। यह काम दिन-दिन बढ़ रहा है, घट नहीं रहा। इस आन्दोलनसे मध्यम श्रेणीके कमसे-कम २,००० आदमियोंका भरण-पोषण हो रहा है। और खादी-प्रवृत्ति कमसे कम एक लाख गरीब स्त्रियोंके लिए अन्नपूर्णा बनी हुई है। इससे दस हजार जुलाहोंको रोजी मिल रही है, और धोबी, रंगरेज, पिंजारे, दर्जी आदिको जो रोजी मिलने लगी है, सो तो जुदी है। इतने पर भी जिसे यह आन्दोलन या इसके कारण उत्पन्न खादी जहर-सी लगती है, वह कमनसीब है।
पण्डित जवाहरलाल या श्री सुभाषचन्द्र बोस इतने भोले या आलसी नहीं हैं कि युवकोंका संगठन करनेके लिए मेरी आज्ञाकी बाट जोहते रहें। वे अपनी सामर्थ्यके अनुसार युवकोंको संगठित कर रहे हैं। उन्हें न केवल मेरी आज्ञाकी जरूरत ही नहीं है, बल्कि वे ऐसे योद्धा हैं जो मेरे रोके रुक नहीं सकते। बात तो यह है कि आगे बढ़कर काम में गड़ जानेवाले एक करोड़ तो क्या, दस हजार नौजवान भी आज तैयार नहीं हैं। मुझे विश्वास है कि अगर वे चाहें तो तत्काल सामने आ सकते हैं। मगर आज उनके दिल इस ओर रुजू नहीं हो रहे हैं। अकेले भाषणों, तमाशों, जुलूसों आदिसे स्वराज्य नहीं मिल सकता। स्थायी और रचनात्मक कामकी बड़ी आवश्यकता है।
यह कहना भी ठीक नहीं है कि अगर कर्णधार हो तो लोग असहयोग या सविनय भंगके लिए तैयार हैं। अगर मेरी शर्तोंको स्वीकार कर असहयोग या सविनय भंगके जहाजपर चढ़नेवाले मुसाफिर मिलें तो उन्हें लेकर चलने――उनका कर्णधार बनने――का काम मुझे पूरी तरह पसन्द आये। मगर मैं निराशावादी नहीं हूँ, इसलिए यह आशा लगाए बैठा हूँ कि पहली जनवरी तक शुभ संयोग पैदा हो ही जायेंगे।
सरदार वल्लभभाईको भी मेरे हुक्मकी जरूरत नहीं है, अथवा यों कहिए कि हुक्म तो उनकी जेब में पड़ा है। लेकिन हुक्म पर अमल करनेके लिए बारडोली ताल्लुके चाहिए। बारडोलीको अपनी मर्यादामें रहकर लड़नेकी तैयारी करनेमें सात वर्षोंका समय लगा था। आज तो यही शंका हो रही है कि बारडोली भी स्वराज्य-