२२० पत्र: एन॰ आर॰ मलकानीको
(११ अगस्त, १९२९)[१]
तुम्हारा पत्र मिला। वल्लभभाई द्वारा भेजे चेकके अलावा और जो भी कुछ सम्भव होगा मैं भेजूँगा। ये चीजें आदमीकी शक्तिसे कहीं अधिक ही होती चली जा रही हैं।
तुम्हारा,
बापू
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८९४) की फोटो-नकलसे।
२२१. भेंट: ‘हिन्दू’ के प्रतिनिधिसे[२]
बम्बई
१२ अगस्त, १९२९
गांधीजीने आज मुझे अकेलेको ही अलग से मुलाकातका अवसर दिया।
श्री मैकडोनॉल्डके भाषण तथा सम्राटके भाषण में हिन्दुस्तानका उल्लेख न होनेके सम्बन्धमें उनके विचार पूछनेपर गांधीजीने उत्तरमें कहा:
“मैंने पूरा भाषण नहीं पढ़ा है। मैं इस विषय में कोई भी विचार व्यक्त करनेमें असमर्थ हूँ।”
उन्हें भारतीय लोकमत से तालमेल बैठानेकी (मजदूर दलकी सरकारकी) ‘चिन्ता’-के बारेमें भारत-सचिव और मन्त्रिमण्डलके अन्य सदस्योंसे भेंट करनेवालोंको प्रतिक्रिया बताये जाने पर गांधीजीने कहा:
मैं लेबर-सरकारकी कठिनाई खूब समझता हूँ। सब-कुछ इसपर निर्भर करेगा कि वह क्या प्रस्ताव हमारे सामने रखती है।
जब यह कहा गया कि साइमन कमीशन, जिसके सम्बन्धमें मजदूर-दल (लेबर पार्टी) वचन-बद्ध है, अभीतक अपना कार्य पूरा नहीं कर पाया है, गांधीजीने कहा: