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२२८. तार: पुरुषोत्तमदास टण्डनको[१]
[१४ अगस्त, १९२९ को या उसके पश्चात्]
कृपया २१ को अथवा उससे पहले साबरमती अवश्य आइए।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५४५२) की फोटो-नकलसे।
२२९. बिना राँधा आहार
प्रिय महाशय,
- आप अपने आहार-सम्बन्धी प्रयोगोंके सम्बन्धमें जो-कुछ लिख रहे हैं उसकी ‘हिन्दू’ के २२ जुलाईके अंकमें उद्धृत एक नयी किस्त[२] मैंने बहुत चाव से पढ़ी और मुझे यह देखकर खुशी हुई है कि दूध और दूध से बने पदार्थोंके खिलाफ आपकी आपत्ति इस हद तक नहीं जाती कि आप ‘भारतको युवा-पीढ़ी’ को उसको त्याग देनेकी सलाह दें। सच तो यह है कि आप अपन प्रयोग के परिणामोंको काफी निष्पक्ष भावसे प्रस्तुत कर रहे हैं। किन्तु आपके इस विवरणमें मुझे तथ्यकी दो भूलें दिखाई देती हैं। वनस्पति-सृष्टिसे मनुष्यको इतना पोषण प्राप्त हो सकता है या नहीं कि वह अपनी शक्तिके उच्चतम स्तर पर काम कर सके, आधुनिक चिकित्सा-विज्ञानन इस प्रश्नकी छान बीन न की हो ऐसा नहीं है। उसने इस प्रश्नकी छानबीन की है और बताया है कि वनस्पति-सृष्टिकी इस क्षमताकी एक सीमा है। शुद्ध शाकाहारसे प्राप्त होनेवाले पोषणके सीमित होने का एक कारण तो यह है कि मनुष्यके पेटकी रचना और लम्बाई शाकाहारी प्राणियोंके पेट से भिन्न है। मनुष्यको पाक-प्रणाली न तो इतनी लम्बी है और न उसमें इतनी जगह ही है कि उसमें उपयुक्त शाकान्न पर्याप्त मात्रामें समा सके। इसके सिवा जितना उसमें समा सकता उससे वह मनुष्यके शरीरके पूर्ण स्वास्थ्य के लिए आवश्यक सारा पोषण खींच भी नहीं सकती। (ब) सिर्फ एक विटामिन――विटामिन डी ऐसा है जिसके लिए मनुष्य (बड़ी हद तक) सूर्य पर निर्भर रह सकता है। उससे दूसरे महत्वपूर्ण विटामिन भी प्राप्त किये जा सकते हैं, ऐसा माननेका हमारे पास कोई आधार