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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/३६४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

लेता, लेकिन मैं एक आदर्श डेरी चला रहा हूँ जहाँकी गायोंका दूध भारतमें अन्यत्र किसी भी जगह पैदा होनेवाले इस तरहके दूधसे शुद्धता और मक्खनकी अपनी मात्रामें अच्छी तरह स्पर्धा कर सकता है।

डॉ॰ मॅक-कॅरीसनने चिकित्सा-विज्ञानका नाम लेकर जो दावा किया है उसके बावजूद मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि मनुष्यको शाकाहारके द्वारा पूरा पोषण कैसे मिले, इस बातको ध्यान में रखकर वैज्ञानिकोंने अभी तक बीजों, पत्तियों और फलोंके असंख्य प्रकारोंकी छिपी हुई सम्भावनाओंकी पूरी खोज नहीं की है। इसका एक कारण तो यह है कि जैविक आहारके साथ कितने ही लोगोंके स्वार्थ जुड़ गये हैं और इन जबर्दस्त स्वार्थोक प्रभावके फलस्वरूप डाक्टरीका धन्धा करनेवाले लोग इस सवाल पर तटस्थ वृत्तिसे विचार करनेमें असमर्थ हो गये हैं। मुझे ऐसा दिखाई देता है कि इस रास्तेकी विकट कठिनाइयोंको पार करने और अपने प्राणोंकी बाजी लगाकर भी इस विषयके सत्यको ढूंढ निकालनेका काम निष्णात डाक्टर लोग नहीं, बल्कि सामान्य परन्तु उत्साही जिज्ञासु व्यक्ति ही करेंगे। यदि सत्यके इन विनम्र शोधकोंको वैज्ञानिक लोग मदद दें, तो मुझे उसीसे सन्तोष हो जायेगा।

मैं डॉ॰ मैक-कैरीसनके विटामिन-सम्बन्धी ज्यादा सही जानकारी देनेके लिए उनका आभारी हूँ।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, १५-८-१९२९
 

२३०. टिप्पणियाँ

काली चमड़ी

तो अब आखिर यह फैसला हो ही गया कि एक जगत-प्रसिद्ध मासिक-पत्रके सम्पादकको, एक अमेरिकन भूतदयावादी द्वारा लिखे गये और मासिक पत्रमें समय-समय पर प्रकाशित किये गये लेखोंको पुस्तक रूपमें छपानेके अपराधमें १०००) का दण्ड भरना पड़ेगा। डा॰ संडरलैंडकी ‘इंडिया इन बॉन्डेज’ नामक पुस्तक और कुछ नहीं, ‘माडर्न रिव्यू’ में प्रकाशित उनके लेखोंका संग्रह ही है। मैंने इन पृष्ठों में बार-बार लिखा है कि जिस धाराके आधार पर श्री रामानन्द चटर्जी पर अपराध लगाया गया था, वह इतनी व्यापक और रबरके समान विस्तारशील है कि जो सच बातोंको थोड़ा भी निडरताके साथ व्यक्त करता है, ऐसे प्रायः हरएक व्यक्तिको उसके अनुसार अपराधी ठहराया जा सकता है।[] उक्त धाराके अनुसार रामानन्द बाबू जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तिको मुजरिम करार देना न्यायका उपहास करना है। लेकिन रामानन्द बाबूका बड़ा दोष तो यह है कि उनकी चमड़ी काली है। उनके कपाल पर काले कुलीकी छाप लगी हुई है और यही वजह है कि उन्हें और उनके प्रकाशकको भीषण पाप

  1. देखिए “डॉ॰ संडरलैंडकी पुस्तक” १३-६-१९२९।