सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/३७३

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
३३५
ग्राम-शिक्षा

और बहुधा इस ज्ञानके अभाव में अज्ञानपूर्ण अन्धविश्वासोंका उनपर जबर्दस्त असर रहता है। काकासाहबकी इच्छा है कि इस पूर्ति द्वारा उनके ये अन्धविश्वास दूर हों और उन्हें कुछ उपयोगी ज्ञान मिले।

आरोग्यके लिहाजसे गाँवोंकी हालत बड़ी ही दर्दनाक है। हमारी गरीबीका यह एक सबल कारण है कि आरोग्यका जो ज्ञान आवश्यक और सहज प्राप्त है, उसका भी हममें अभाव है। अगर गाँवोंके स्वास्थ्य एवं आरोग्यमें सुधार हो सके तो सहज ही लाखों रुपये की फिजूलखर्ची बच जाये और उस हद तक लोगोंकी स्थिति भी सुधर जाये। तन्दुरुस्त किसान जितना काम कर सकेगा, रोगी किसान उतना कदापि नहीं कर सकता। हमारे यहाँ मृत्युकी संख्या असाधारण है और इसकी वजहसे जो नुकसान हो रहा है, वह साधारण नहीं है।

कहा जाता है कि हमारी गिरी हुई और दर्दनाक तन्दुरुस्तीका कारण हमारी आर्थिक दरिद्रता है; अगर यह गरीबी दूर हो सके तो तन्दुरुस्ती अपने आप सुधर जाये। सरकारको गालियाँ देने या सारा दोष उसीके मत्थे मढ़नेके लिए कोई भले ही यह बात कहे, मगर इसमें आधेसे भी कम सचाई है। मेरा अपना अनुभवसिद्ध मत है कि हमारे अस्वास्थ्य और अनारोग्य में हमारी गरीबीका बहुत थोड़ा हाथ है। गरीबीके कारण कहाँ कितनी अस्वस्थता फैली हुई है, सो मैं जानता हूँ। लेकिन यहाँ इस बातकी चर्चा नहीं करूँगा।

इस लेखमालाका हेतु तो यह बतलाना है कि जो रोग हमारे अपने दोषोंके कारण पैदा होते हैं वे सहज हीं, बहुत थोड़े खर्चसे या बिना खर्चके कैसे या किन उपायों द्वारा दूर हो सकते हैं।

इस दृष्टिसे हम अपने गाँवोंकी हालतकी जाँच करें। हम देखते हैं कि हमारे बहुतेरे गाँव गन्दगीके घर होते हैं। उनमें लोग जहाँ-तहाँ पाखाना फिरते हैं। घरके आंगनों को भी नहीं छोड़ते। पाखाना फिरनेके बाद मैलेको धूल आदिसे ढँकनेकी भी कोई परवाह नहीं करता। गाँवों में रास्ते तो कहीं भी स्वच्छ नहीं होते। जगह-जगह मिट्टीके और कूड़े-करकटके ढेर दिखाई पड़ते हैं। ऐसे रास्तों पर चलते हुए हमें और हमारे बैलोंको भी कष्ट होता है। जिन गाँवों में तालाब होते हैं, उनमें वहीं बरतन साफ किये जाते हैं, वहीं मवेशी पानी पीते हैं, नहाते और पड़े रहते हैं; क्या बालक और क्या बड़े, सब कोई तालाब में ही मैला साफ करते हैं; तालाबके किनारेकी जमीन पर वे पाखाना तो फिरते ही हैं। फिर, वही पानी पीने और भोजन पकानेके काम भी आता है।

मकान बनाने में किसी खास नियमसे काम नहीं लिया जाता। मकानोंके बनवाने में न तो पड़ोसीकी सुख-सुविधाका ख्याल रखा जाता है और न इसी बात पर विचार किया जाता है कि घर में रहनेवालोंको हवा और उजाला बराबर मिलेगा या नहीं।

गाँववालों में सहयोगकी कमी होनेसे वे अपने आरोग्यके लिए आवश्यक वस्तुएँ भी पैदा नहीं कर पाते। वे लोग अपनी फुरसतके वक्तका सदुपयोग नहीं करते, या यों कहिए कि उन्हें वक्तका सदुपयोग करना नहीं आता; इस कारण उनकी शारीरिक और मानसिक शक्ति क्षीण होती चली जाती है।