जो डर लग रहा है, उसका कारण तो यह है कि हम खादीकी शक्तिको भूले बैठे हैं और उसमें अपना विश्वास भी खो चुके हैं। जिस तरह घर-घर रोटी बनाना सरल है उसी तरह घर-घर सूत कातना और खादी बुनना भी सरल है। खादीका सारा दारोमदार सुतपर है। जुलाहे तो आज भी जगह-जगह मिल जाते हैं। मगर कत्तिनें या कतैये इतनी आसानीसे नहीं मिलते।
हाथ-कते सूतकी उत्पत्तिके तीन तरीके हैं, एक स्वावलम्बन, दूसरा मजदूरी; तीसरा यज्ञ। पहला तरीका सबसे ज्यादा व्यापक हो सकता है, और वही सबसे ज्यादा आसान माना जाना चाहिए। इस तरीके का मतलब यह है कि किसान अपनी जरूरत के मुआफिक सूत कात लें और उससे कपड़ा बुनवा लें; इस तरह तैयार की गई खादी उन्हें मिलके कपड़ेसे सदा सस्ती पड़ेगी। इस तरीके का एक लाभ और भी है कि कपड़े ग्राहक ढूंढते फिरनेकी मेहनत बच ही जाती है। जो लोग शहरोंमें रहते हैं या जो किसान नहीं हैं, उन्हें खादी तैयार मिलनी चाहिए। ऐसे लोगोंके लिए दूसरा तरीका मुफीद है, यानी मजदूरी देकर सूत कताना। आज इसीका जोर है; यही खूब सफल हो रहा है; क्योंकि खादी प्रवृत्तिकी शुरुआत इसीसे हुई, और यहीं एक तरीका सम्भव था। खादीकी प्रवृत्तिकी शुरुआत तो मध्यम श्रेणी और शिक्षित वर्गसे हुई है। उनकी यह स्थिति नहीं थी कि वे स्वावलम्बनकी पद्धतिसे खादी बनवाकर पहनते। भारतमें भूखसे पीड़ा पानेवालोंका एक ऐसा वर्ग है, जिसे अगर प्रतिदिन एक आना और मिलने लगे तो उसका दारिद्रय दूर हो जाये। इसी विचारसे मजदूरी देकर सूत कतवाना शुरू किया गया। इस तरीके में एक बड़ा लाभ और भी है। इस तरीके की वजहसे मध्यम श्रेणीकी संगठन शक्ति बढ़ी है, एक बड़ा सेवा-तन्त्र पैदा हुआ है, और मध्यम श्रेणीके लोगोंके लिए ईमानदारीके साथ जीविका कमानेका एक बड़ा और नया जरिया पैदा हुआ है। यह लाभ कोई छोटा-मोटा लाभ नहीं है। तीसरा तरीका यज्ञार्थ सूत कातनेका है। अनुकूल वायुमण्डलके अभाव में इसकी गति बहुत मन्द रही है। अगर यज्ञका वायुमण्डल तैयार किया जा सके तो इस तरीकेसे करोड़ों गज सूत उत्पन्न किया जा सकता है। म्युनिसिपल स्कूलोंमें, जहाँ हजारों लड़के-लड़कियाँ पढ़ते हैं, खेल-ही-खेलमें तकलीपर बहुत-सा सूत कात लिया जा सकता है। इस तरह खर्च कम पड़ेगा और काम निरन्तर चलता भी रहेगा। इस तरह तैयार सूत फौरन जुलाहेके घर पहुँचाया जाकर उसकी खादी बनवाई जा सकती है और यह लोगों में विश्वास पैदा कर सकता है। इस कामकी व्यवस्था सहज ही हो सकती है। इसी तरह अगर तीनों तरीकोंसे पूरा-पूरा काम लिया जाये तो भारत में मनमाना सूत पैदा किया जा सकता है; दूसरे शब्दोंमें, जरूरत के मुताबिक खादी पैदा करना बिलकुल आसान हो सकता है।
नवजीवन, २-६-१९२९