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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/३८५

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बिना राँधा आहार

क्या असर होगा, सो तो मैं इस लेखके, जिसे रविवारकी रातको[] लिख रहा हूँ, अन्तमें लिखूँगा।

मालूम होता है कि जो कच्चा आहार मैं लेता था, उसे बराबर पचा नहीं पाता था। और जिसे मैं साफ दस्त होना समझ रहा था वह भी पेचिशकी पूर्व-भूमिका ही थी। मगर कुल मिलाकर स्वास्थ्य और शक्ति मालूम होती थी इसलिए किसी खराबीके पैदा होनेकी आशंकाका कोई कारण नहीं लग रहा था।

मेरे साथियोंमेंसे भी एक-एक करके कईने प्रयोग छोड़ दिया है। चार साथी अभी टिके हुए हैं, जिनमें एक तो करीब साल-भर से बिना पकाया हुआ आहार ले रहे हैं, और उनके विचारसे वे अपने प्रयोग में काफी सफल हुए हैं।

साथियोंके प्रयोग छोड़ देनेका कारण यह है कि उन्हें कमजोरी महसूस हो रही थी और हर सप्ताह उनका वजन गिरता जा रहा था।

इस तरह श्री गोपालरावका यह दावा कि आग पर बिना पकाया हुआ आहार हर प्रकृति और हर उम्र के स्त्री-पुरुषोंके लिए उपयुक्त है, यानी छोटे-बड़े, रोगी और नीरोग सब लोग इससे लाभ उठा सकते हैं, असिद्ध ठहरता है। इस भासमान असफलता से उत्साहियोंको चेत जाना चाहिए और अपने बयानमें बड़ी सावधानी, सचाई और संयमसे काम लेना चाहिए और बड़ी छानवीनके साथ किसी निश्चय पर पहुँचना चाहिए।

मैं असफलताको भासमान इसलिए कहता हूँ कि अग्निसे अछूते आहारमें आज भी मुझे वही विश्वास है, जो आजसे करीब चालीस साल पहले था। नाकामयाबीका कारण तो यह है कि अग्निसे अछूते आहारके प्रयोगकी विधि और क्या-क्या चीज कितनी ली जाये इसका मुझे सच्चा ज्ञान नहीं था। इस प्रयोगके जो दो चार अच्छे परिणाम निकले हैं वे सचमुच आश्चर्यजनक हैं। किसीको कोई बड़ा कष्ट नहीं सहना पड़ा। मुझे भी पेचिशसे कोई कष्ट नहीं हुआ। जिस किसी डाक्टरने मेरे स्वास्थ्यकी जाँच की है, हरएकने स्वास्थ्यको वैसे पहलेसे बेहतर बतलाया है। अपने साथियोंके लिए मेरी रहनुमाई, अन्धेका अन्धोंको राह दिखाने जैसी थी। मुझे इस बातका दुःख है कि इस प्रयोगके लिए कोई ऐसा रहनुमा न मिला, जिससे अग्निसे अछूते आहारकी बारीक जानकारी और एक वैज्ञानिक जैसा धीरज प्राप्त होता।

लेकिन अगर मेरी तन्दुरुस्ती ठीक हो गई और मुझे थोड़ा अवकाश मिला तो मैं इन गलतियोंसे बचनेका लाभ उठा कर फिरसे कच्चे अन्नका प्रयोग शुरू करनेकी आशा रखता हूँ। एक सत्य-शोधकके नाते मैं इस बातकी खोज करना आवश्यक समझता हूँ कि मनुष्यके शरीर, मन और आत्माके स्वस्थ रखने योग्य परिपूर्ण आहार क्या हो सकता है। मेरा विश्वास है कि इस तरहकी खोज अग्निसे अछूते आहारको लेकर ही सफल हो सकती है और मैं यह भी मानता हूँ कि अन्तहीन वनस्पति-जगत्में पूरी तरह दूधका स्थान ले सकनेवाली कोई न कोई वनस्पति अवश्य है। दूधके बारेमें यह तो हरएक डाक्टर स्वीकार करता है कि दूधमें कुछ दोष निहित हैं और कुदरतने

  1. १८ अगस्त, १९२९।