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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/३९०

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

उतनी नहीं। दूसरे पथके पथिक बननेसे भी थोड़ी-बहुत हिंसाका डर तो रहता ही है, मगर यह हिंसा मर्यादित होगी और धीरे-धीरे इसका परिमाण घटता जायेगा।

आजकल हमारा राष्ट्रीय ध्येय अहिंसाका ध्येय है। मगर मन और वचनसे तो हम हिंसाकी ही ओर झुकते दिखते हैं। वातावरण में अधैर्य भरा हुआ है; और हमारे हिंसा में प्रवृत्त न होने का एकमात्र कारण हमारी कमजोरी ही है। ज्ञानपूर्वक और शक्तिका भान होते हुए भी शस्त्र-त्याग करनेमें ही सच्ची अहिंसा है। मगर इसके लिए कल्पना-शक्ति और जगतकी प्रगतिके रुखको पहचाननेकी शक्ति होनी चाहिए। आज हम पाश्चात्य देशोंकी बाहरी तड़क-भड़कसे चौंधिया गये हैं, और उनकी उन्मत्त प्रवृत्तियों को भी प्रगतिका लक्षण मान बैठते हैं, फलस्वरूप हम यह नहीं देख पाते कि उनकी यह प्रगति ही उन्हें विनाशकी ओर ले जा रही है। हमें समझ लेना चाहिए कि पाश्चात्य लोगोंके साधनों द्वारा पश्चिमी देशोंकी स्पर्धामें उतरना अपने हाथों अपना सर्वनाश करना है। इसके विपरीत अगर हम यह समझ सकें कि इस युगमें भी जगत नैतिक बल पर ही टिका हुआ है, तो अहिंसाकी असीम शक्ति में हम अडिग श्रद्धा रख सकेंगे और उसे पानेका प्रयत्न कर सकेंगे। सभी इस बातको मंजूर करते हैं कि अगर सन् १९२२में हम अन्ततक शान्तिपूर्ण वातावरण बनायें रखने में सफल होते तो हम अपने ध्येयको सम्पूर्ण सिद्ध कर सकते। फिर भी हम इस बातकी जीती-जागती मिसाल तो पेश कर ही पाये थे कि यत्किचित् अहिंसा भी कितनी असरकारक हो सकती है। उन दिनों हमने स्वतन्त्रताका जो सार समझा और पाया वह आज भी कायम है। सत्याग्रह युगके पहलेकी भीरुता आज सदाके लिए निःशेष हो चुकी है। इसलिए मेरी समझ में अहिंसा बल पानेके लिए हमें धैर्यसे काम लेना होगा, समयकी प्रतीक्षा करनी होगी। यानी, अगर सचमुच ही हम अपना रक्षण करना चाहते हों और संसारकी प्रगति में स्वयं भी हाथ बँटानेकी इच्छा रखते हों, तो उसके लिए तलवार-त्याग――पशुबल-त्याग――के सिवा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २२-८-१९२९