पीड़ित प्रदेशोंके लिए भेजी गई समझँगा । सिन्धके लिए जो कुछ मिला है, उसके बँटवारेको व्यवस्था आचार्य मलकानीके हाथों रहेगी। पिछले गुजरात- जलप्रलय-कोषसे १५,०००) सरदार वल्लभभाई सिन्धके लिए भेज ही चुके हैं ।
२६२. पुरानी कहानी
अपने तारीख २५ के अंकमें आपने राजस्व अधिकारियोंके दमन चक्रको चर्चा की है और चालू वर्तमान व्यवस्थाके कारण सरकारके सिर दोष मढ़ते हुए आपने यह स्वीकार किया है कि किसानोंपर 'उनके अपने लोग' ही अत्याचार कर रहे हैं; अपने अग्र-लेखमें आपने लिखा है कि जबतक वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्थामें आमूल परिवर्तन नहीं किया जाता तबतक "शासन की बागडोर भारतीय अधिकारियोंके हाथोंमें आ जानेपर भी ऐसी ही तीव्रतासे जनताका दमन होता रहेगा ।" अस्तु, लगता अस्तु, लगता है कि अब दो बातोंकी आवश्यकता है। पहली आवश्यकता है कि किसानोंकी स्थिति और उनके हितोंपर और ज्यादा बारीकी से विचार करनेकी गुंजाइशके लिए भू-राजस्व-नियमोंमें उचित संशोधन हो; यह प्रचार आन्दोलन छेड़कर और विधान परिषदोंमें अपने प्रतिनिधियोंके जरिए आवाज उठाकर हासिल किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए। दूसरी आवश्यकता उन लोगोंके हृदय परिवर्तन की है जो मूलतः किसानोंमेंसे ही आये हैं, पर जो बहुधा स्वार्थवश अपनी छोटी-मोटी सत्ताका प्रयोग किसानोंपर अत्याचार करनेके लिए करते हैं। सरकारकी सद्बुद्धि जगाने के प्रयासोंमें 'हृदय परिवर्तन' शब्दका प्रयोग ज्यादा ठीक समझा जाता है । किन्तु आशंका तो इसी बात की है कि यह दूसरा तरीका कहीं अधिक कठिन सिद्ध होगा ।
महोदय, क्या आप इसमें एक सुधारके लिए प्रयत्न करेंगे । रयतवारी पद्धतिके अन्तर्गत आनेवाले किसानोंका एक संघ बनायें और उसकी गतिविधियाँ रैयतको उनके अधिकारोंकी जानकारी देने तक सीमित रखें। इसके बाद उनके हितोंके लिए विधान परिषदोंमें आवाज उठायें और नियमोंमें संशोधन के लिए प्रयत्न करें और उन्हें शराब पीनेकी ओरसे विरत करें। नशाबन्दीका यह काम उस सरकारके विरुद्ध एक अस्त्रकी तरह प्रयुक्त मत कीजिए जिसे