सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/४०१

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
३६३
एक काठियावाड़ी का सन्ताप

हटाते हैं और स्वयं भी सुनी-अनसुनी करते हैं। . . काठियावाड़के राजदर- बारियोंने आपके चारों ओर जो वायुमण्डल पैदा कर दिया है, उसे भेद कर आप दूसरे पहलुओं पर भी दृष्टि डालें और 'यंग इंडिया' तथा 'नवजीवन द्वारा एवं राजकोटको युवक परिषदके व्यासपीठ परसे, 'अमानुषी अत्याचार' के खिलाफ एक बार अपना पुण्य प्रकोप प्रकट करें। • •

किसी काठियावाड़ीको इस तरह लिखनेका अधिकार है। युवक वर्ग जो कहे उसे धैर्यपूर्वक सुनना मेरा धर्म है । प्रत्येक कर्त्तव्यके पालनमें अधिकार निहित रहता है, और प्रत्येक अधिकारके प्रयोगसे कर्त्तव्य पैदा होता है । इस तरह अधिकार और कर्तव्यका चक्र चलता ही रहता है । काठियावाड़ी युवकने मेरे सामने अपना दुखड़ा रोकर अपने अधिकारका उपयोग किया है । मैंने धर्यपूर्वक उसे सुनकर अपना धर्म पाला है, और अब मुझे युवकको सुनानेका अधिकार प्राप्त हुआ है, तथा काठिया- वाड़ी युवकका यह कर्तव्य हो गया है कि वह मेरी बात सुने । सुननेका मतलब इस कानसे सुनकर उससे निकाल डालना नहीं, बल्कि सुनना यानी समझना और उसे हजम करना है ।

भावनगर में दिया हुआ वचन मुझे याद है । मैं स्वयं निराश नहीं हुआ हूँ । मैं बराबर प्रयत्नशील हूँ । इस प्रयत्नका फल प्राप्त करा देना मेरे हाथकी बात नहीं है । फलका अधिकार ईश्वरने अपने हाथोंमें रखा है । यह कोई आवश्यक नहीं है कि मेरे तमाम प्रयत्न प्रकट-रूप में ही हों । कोई यह भी न समझे कि मेरे प्रयत्न राजाओंसे मिलकर ही होते हैं । वे प्रत्यक्ष भी हो सकते हैं, अप्रत्यक्ष भी । सम्भव है उनका आरम्भ और अन्त प्रार्थनामें ही परिसमाप्त हो जाता हो । मेरे इस कथनसे काठिया- वाड़ी युवक या दूसरे पाठक हँसे नहीं; कोई यह भी न समझे कि मैं जैसे-तैसे अपना निरर्थक बचाव करना चाहता हूँ। सभी जानते हैं कि मैंने जीवन-भर इसी तरह किया है। दक्षिण आफ्रिकामें वर्षों तक मेरा प्रयत्न केवल प्रार्थना तक ही परिमित था, और मेरी मान्यता है कि मेरा यह प्रयत्न बहुत सफल हुआ है । अगर प्रार्थनाकी यह बुनियाद नहीं होती तो पूरी-अधूरी भली-बुरी जो भी चिनाई वहाँ हो सकी, वह कदापि न होती । यह कहा जा सकता है कि आजकल मैं हिन्दू-मुस्लिम ऐक्यके लिए कोई भी प्रत्यक्ष प्रयत्न नहीं करता, फिर भी मेरा अपना तो दावा है कि मैं उसके लिए सतत प्रयत्नशील हूँ । मैं हमेशा अपना दाँव देखता रहता हूँ, और इस तरह के अवसर मुझे मिलते भी रहते हैं । अतएव मेरी चुप्पी परसे कोई यह न समझ ले कि मैं राजाओंके विषय में न तो कुछ करता हूँ, न कुछ सोचता ही हूँ ।

फिर भी मैं जानता हूँ कि अधीर पाठक तो मेरे प्रयत्नकी परीक्षा केवल परिणामके आधार पर ही कर सकते हैं । अतएव अगर वे मुझे न पहचानें, मुझपर गुस्सा करें, मेरी हँसी उड़ायें, तो उसे भी मैं धैर्यपूर्वक सहन करूँगा, और जिस तरह बूढ़े पेड़ने ' हँसती-खेलती कोंपलों' - से कहा था उसी तरह शायद मैं भी कहूँगा, 'हमपर जो बीती है, सो तुमपर भी बीतेगी। बच्चाजी । जरा धीरज तो रखो ।'