होगा उसकी कल्पना मैं कर सकता हूँ । जिस चीजके पानेके लिए वे रात-दिन तड़पते रहते हैं, जिससे हिन्दू-समाज उन्हें आजतक वंचित रखता आया है, उसके मिलने पर उन्हें आनन्द क्यों न होगा ? लेकिन यह शुरूआत समुद्र में बूंदके समान है । भारतमें हिन्दू मन्दिर लाखोंकी संख्या में हैं। जबतक अछूत भाइयोंके लिए देशके हरएक सार्व- जनिक मन्दिरका दरवाजा खुल नहीं जाता, हिन्दू धर्मके उपासक दोषी बने रहेंगे और उनके लिए दुनियाके सामने सिर उठाकर चलना मुहाल होगा । अछूतोंका बहि- ष्कार करके हिन्दू-समाज स्वयं संसारसे बहिष्कृत किया गया है। हिन्दू-समाज इस बहि- ष्कारमेंसे बचनेका उपाय इलिचपुर और वर्धा सीख ले ।
बलसाड़के भंगी भाई
इस सम्बन्ध में नीचे दिया जा रहा दुःखद पत्र मिला है[१]
यदि पत्र में दी गई जानकारी सही है तो यह बलसाड़ नगरपालिका और नगर- निवासियोंके लिए लज्जाकी बात है । थोड़े-बहुत परिश्रम और यत्किचित् द्रव्यसे जो सुधार हो सकते हैं उसके लिए उत्तरदायी संस्था अथवा व्यक्तियोंका उस ओरसे उदासीन रहना, अशोभनीय है । धनिक वर्ग आसानीसे बिना कुछ दिये जो पानी प्राप्त कर पाता है उसीके लिए भंगी भाई-बहनोंको मारा-मारा फिरना पड़े और उसके लिए पैसे भी देने पड़ें इसे कैसा मानें ? मैं आशा करता हूँ कि यदि ऊपर दिये गये तथ्य ठीक हैं तो बलसाड़ नगरपालिका और उस नगरके निवासी उनका तुरन्त उपाय करेंगे ।
२७६. पत्र : वसुमती पण्डितको
२५ अगस्त, १९२९
तुम्हारा पत्र मिला । मैं भाषाकी भूलें करता हूँ इससे तुम्हें भूल करनेका अधि- कार नहीं मिल सकता। मेरे दाँत न हों तो क्या तुम्हें भी निकाल देने होंगे ? मेरा अज्ञान तो निभ गया । मेरे वारिसोंका नहीं निभ सकता । अब मेरी तबीयत अच्छी
१. यहाँ नहीं दिया जा रहा है। कहा गया था कि उन्हें पठान साहूकारोंके पंजेसे छुड़ाने तथा रहने और पीने के पानीके लिए बलसाडकी नगरपालिकाने कुछ नहीं किया है। नागरिक भी इस ओर से आँखें बन्द किये हुए हैं। पत्र लेखकने नवसारी नगरपालिकाकी इस मामले में प्रशंसा की थी और आशा की थी कि बलसाड़ नगरपालिका भी उसका अनुसरण करेगी।
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