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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/४२२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

उनका छठवाँ और अन्तिम प्रश्न यों है :

६. जिस प्रकार आप मनुष्य मात्रके लिए सत्य और अहिंसाका एक ही मार्ग बतलाते हैं, उसी प्रकार क्या आप उपासनाका कोई एक मार्ग सबके लिए उचित नहीं समझते ? फिर वह उपासना तथा प्रार्थना चाहे किसी भी भाषामें क्यों न की जाये ।

सत्य और अहिंसा सर्वव्यापक सिद्धान्त या तत्व हैं । उपासना मनुष्यकृत एक आवश्यक प्रचण्ड साधन है । इसलिए वह देशकालसे परिमित है और उसमें विविधता रहती है, रहना आवश्यक भी है । उसका अन्तिम निचोड़ तो एक ही है । जैसे, कहा भी है कि, सब नदियोंका पानी जिस तरह समुद्र में गिरता है, उसी तरह सब देवोंके प्रति की गई वन्दना, किया गया नमस्कार मात्र केशवको पहुँचता है ।

हिन्दी नवजीवन, २९-८-१९२९

२८९. पत्र : वसुमती पण्डितको

३० अगस्त, १९२९

चि० वसुमती,

तुम्हारा पत्र मिला । यदि वहाँसे छुट्टी मिले तो दो-तीन दिनके लिए जरूर चली आओ। मैं नियमपूर्वक रोज घूमने जाता हूँ ।

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (एस० एन० ९२६४ ) से तथा (सी० डब्ल्यू० ५११) से भी । सौजन्य : वसुमती पण्डित

२९०. पोंजन और धनुर्विद्या

हमारी भाषा गुजरातीमें पींजना अप्रतिष्ठित शब्द है ।आलंकारिक भाषामें भी वह निन्दावाचक अर्थमें प्रयुक्त होता है । जो व्यर्थ ही किसी बातको बार-बार दुहराया करता है उसके सम्बन्धमें हम कहते हैं: "वह तो पींजा ही करता है । " शब्दका ऐसा उपयोग रूढ़ हो जानेके कारण पींजन - शास्त्र या पींजन-विद्या शब्द भी सुहावना नहीं लगता । पींजनकी एक नई किस्म जो 'बारडोली 'बारडोली धनुष 'के नामसे विख्यात है, धनुषाकार बाँसकी बनाई जाती है, और धनुष जैसी ही होती है, अतएव मैंने पींजन - शास्त्र के बदले क्षत्रियोचित और आदर प्राप्त धनुविद्या शब्दका उपयोग करनेकी घृष्टता की है। इसके लिए मैं विद्वानोंसे क्षमा चाहता हूँ । रूढ़ शब्दका इस तरह स्वतन्त्र प्रयोग होता देखकर अगर भाषा के अन्य प्रेमी भी मुझपर क्रोध करें, तो मैं उनसे भी क्षमाकी प्रार्थना करता हूँ ।