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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/४२३

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पींजन और धनुविद्या

लेकिन मेरे विचारमें जब हमारी भाषाका विकास हो रहा है, उसमें नये विचार प्रवेश पा रहे हैं, नई शोध की जा रही है, वीरता आदिका क्षेत्र विस्तृत होता जा रहा है, तब हमारे लिए यह आवश्यक हो जाता है कि हम शब्दोंके उपयोगके सम्बन्धमें उदारतासे काम लें ।

वर्षों पहलेसे मैं जिस स्वतन्त्र ढंगसे शब्दोंका प्रयोग करता आया हूँ, पाठक उससे अनजान नहीं हैं। मैंने क्षत्रिय शब्दकी नई व्याख्या की है। जो मारनेकी विद्या जानता है, वह क्षत्रिय नहीं, बल्कि जो मरकर दूसरोंको जिलानेकी विद्या हस्तगत करता है वही क्षत्रिय है । क्षत्रिय वह भी है जो सतत चलते रहनेवाले जगतके देवासुर संग्राममें 'अपलायनम् 'के मन्त्रकी ठीक-ठीक सिद्धि प्राप्त करता है और जो दयाकी साक्षात् मूर्ति है । ऐसे क्षत्रियकी धनुर्विद्या क्या होगी ? इस प्रश्नपर विचार करते हुए जिस तरह बढ़ईका मन सहज ही बबूलकी ओर खिंचता है, उसी तरह अगर मेरा मन पींजनकी ओर दौड़ जाये तो आश्चर्य ही क्या ? अगर हम पींजनको निर्दोष बना लें और नौजवान उसके उपयोग में दक्षता प्राप्त कर लें, तो वे प्रतिदिन थोड़ा समय खर्च करके भी लाखों स्त्रियोंकी सेवा कर सकते हैं । कताईशास्त्र के जानकार पुकार-पुकार कर कहते हैं कि अगर धुनाई एकसी हो, पूनी में रेशे अलग- अलग और एक सीधमें जमे रहें तो सुत सहज ही अच्छा, यकसां और मजबूत निकले । अगर कोई मुफ्त ही पूनियाँ बनाकर दे तो जो बहनें आज पींज नहीं रही हैं और जो कभी पींजेंगी भी नहीं, उनकी बड़ी भारी सेवा हो सके। और अगर यह हो सके तो खादीको सस्ता करनेमें बड़ी मदद मिले । कताई- कामकी गति चीटीकी सी है; मगर धुननेकी या यों कहिये कि धनुर्विद्याकी गति ऐसी नहीं है । दूसरे, धनुर्विद्या में बाहुबल और हृदयबलको खासी जरूरत रहती है। जिसे देखना हो, वह एक पिंजारेका सोना देखे । हर पिंजारेका सीना मनमें ईर्ष्या उपजानेवाला होता है; गोला- कार, उठा हुआ और सुन्दर । उसके हाथके स्नायु भी उतने ही सुगठित होते हैं । एक दृढ़ धनुर्धारी कमसे कम २० बहनोंकी सेवा कर सकता है। क्योंकि वह दस घंटों में कम-से-कम १० सेर रुई तो पींजता ही है । १० घंटों तक दस बारह नम्बरका सूत कातनेवाली २० बहनोंके लिए दस सेर रुई आवश्यकतासे अधिक है । इस परसे कोई भी यह समझ सकता है कि इस विद्याके सीखनेवालेको सन्तोषप्रद गतिसे काम करनेका अवसर मिल सकता है ।

एक बात और; पींजनेका काम, स्वतन्त्र धंधे के रूपमें, प्राचीनकालसे हमारे देशमें होता रहा है, तथा दूसरे धन्धोंके मुकाबले होड़में टिक सका है । आज एक पिंजारेकी माँग प्रतिमास तीस रुपयेकी होती है और उसे इतना मिलता भी है । शुरू-शुरूमें आश्रमने एक पिंजारेको ७० ) प्रतिमास पर रखा था । एक मामूली पिंजारा मी आज ।। ) रोज तो कमा ही लेता है । इस सुन्दर धनुर्विद्याके ज्ञानको सर्व-सुलभ बनानेके लिए एक पुस्तककी जरूरत है । मगनलाल गांधीकृत 'बुनाईशास्त्र 'में इस विषयका भी उल्लेख है; मगर उसमें तो केवल मूल तत्त्वोंकी चर्चा ही हो सकती थी। दूसरे, उसके बाद से अबतक इस विद्याने बहुत प्रगति की है। गुजरात विद्यापीठने इस राष्ट्रपोषक,

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